डीआईजी राजेश सिंह चंदेल सहित चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ डकैती का केस दर्ज,, CCTV फुटेज डिलीट होने पर कोर्ट का सख्त एक्शन

आरोप है कि एसपी चंदेल ने कोई कार्रवाई न करते हुए मामला उसी थाने को भेज दिया। अनूप ने मांग रखी कि थाने की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध करवाई जाए पर पुलिस ने फुटेज को भी नदारद बता दिया।

डीआईजी राजेश सिंह चंदेल सहित चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ डकैती का केस दर्ज,, CCTV फुटेज डिलीट होने पर कोर्ट का सख्त एक्शन

ग्वालियर जिला अदालत के आदेश पर डीआईजी राजेश सिंह चंदेल (तत्कालीन एसपी) सहित चार पुलिसकर्मियों पर लूट और डकैती का मामला दर्ज किया गया। एडीजे सुनील दंडोतिया ने परिवाद स्वीकार कर कार्रवाई के निर्देश दिए।

ग्वालियर में विशेष सत्र न्यायालय ने एक बेहद गंभीर और चर्चित मामले में सख्त रुख अपनाते हुए तत्कालीन ग्वालियर एसपी और वर्तमान में DIG स्तर के अधिकारी राजेश सिंह चंदेल समेत चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ डकैती, लूट, आपराधिक साजिश और साक्ष्य नष्ट करने जैसे गंभीर आरोपों में मामला दर्ज करने के आदेश दिए हैं। इस फैसले के बाद पुलिस विभाग और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है और पूरे मामले पर कानूनी बहस शुरू हो गई है।

मामला क्या है?

यह पूरा मामला वर्ष 2023–24 में दर्ज एक धोखाधड़ी प्रकरण से जुड़ा बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता अनूप राणा और चंद्रलेखा जैन ने आरोप लगाया है कि एक कथित ठगी केस में पुलिस ने जांच और समझौता कराने के नाम पर उनसे भारी रकम वसूली की।

आरोपों के अनुसार, थाटीपुर थाना प्रभारी रहे सुरेंद्र नाथ सिंह, सब इंस्पेक्टर अजय सिंह और हवलदार संतोष वर्मा की भूमिका इस पूरे मामले में सामने आई है।

शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि दिसंबर 2023 में दर्ज एक धोखाधड़ी केस में समझौते के नाम पर पहले 5 लाख 80 हजार रुपये लिए गए और बाद में 25 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग की गई।

घरों से लाखों की वसूली का आरोप

परिवाद में सबसे गंभीर आरोप यह है कि पुलिसकर्मियों ने दबाव बनाकर अलग-अलग घरों से भारी नकदी वसूली।

शिकायत के अनुसार—

अनूप राणा के घर से लगभग 9.5 लाख रुपये

चंद्रलेखा जैन के घर से करीब 15 लाख रुपये

कुल मिलाकर लगभग 24 लाख 75 हजार रुपये कथित रूप से पुलिस द्वारा लिए जाने का दावा किया गया है।

इसके अलावा आरोप है कि थाना प्रभारी के निर्देश पर हवलदार संतोष वर्मा ने यह रकम वसूली और आगे भी अतिरिक्त पैसों की मांग की गई।

धमकी और दबाव के आरोप

शिकायत में यह भी कहा गया है कि जब और पैसे देने से इनकार किया गया तो शिकायतकर्ता पर दबाव बनाया गया और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। यहां तक कि एनकाउंटर तक की धमकी देने का आरोप भी सामने आया है, जिसने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।

एसपी से शिकायत, लेकिन कार्रवाई नहीं

अनूप राणा ने आरोप लगाया है कि उन्होंने उस समय के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राजेश सिंह चंदेल को लिखित शिकायत दी थी, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा, शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्हें ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

बाद में जमानत मिलने के बाद उन्होंने अदालत का रुख किया और पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग की।

CCTV फुटेज और सबूत मिटाने का मुद्दा

सुनवाई के दौरान अदालत ने थाटीपुर थाने के CCTV फुटेज तलब किए थे। पुलिस की ओर से अदालत को बताया गया कि 3 जनवरी 2024 से पहले के फुटेज उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि उन्हें डिलीट कर दिया गया है।

इस जवाब पर विशेष सत्र न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जताई और इसे गंभीर संदेह का विषय माना। अदालत ने टिप्पणी की कि यह स्थिति साक्ष्य नष्ट करने की ओर इशारा करती है, जो न्याय प्रक्रिया पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

कोर्ट का सख्त रुख

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कई दस्तावेज, तकनीकी रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट भी तलब की। प्रारंभिक जांच और तथ्यों के आधार पर कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मामला केवल सामान्य विवाद नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है।

इसके बाद विशेष सत्र न्यायालय ने निर्देश दिया कि सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया जाए।

पुलिस का पक्ष

दूसरी ओर पुलिस विभाग का पक्ष है कि यह मामला असल में एक ठगी गिरोह से जुड़ा हुआ था, जो नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों को धोखा दे रहा था। पुलिस के अनुसार, अनूप राणा और उसका भाई भी उसी नेटवर्क से जुड़े थे।

पुलिस का दावा है कि कार्रवाई कानून के तहत की गई थी और आरोप बेबुनियाद हैं।

दो विपरीत दावे

इस पूरे मामले में दो बिल्कुल अलग-अलग कहानियाँ सामने आ रही हैं—

शिकायतकर्ता का दावा: पुलिस ने समझौते के नाम पर अवैध वसूली की, धमकाया और सबूत मिटाए।

पुलिस का दावा: यह ठगी का मामला था और आरोपी स्वयं एक गिरोह का हिस्सा थे।

पहले भी उठे सवाल

मामले में पहले भी विभागीय जांच के संकेत मिले हैं। कुछ पुलिसकर्मियों को कारण बताओ नोटिस जारी होने की जानकारी भी सामने आई है। अदालत ने इन सभी पहलुओं को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।

22 जून 2026 को होगी अगली सुनवाई

अदालत ने आदेश दिया है कि सभी आरोपी पुलिसकर्मी और अधिकारी 22 जून 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित हों। यह मामला अब आगे चलकर राज्य की सबसे चर्चित कानूनी लड़ाइयों में से एक माना जा रहा है।

प्रशासनिक हलकों में हलचल

इस आदेश के बाद पुलिस विभाग और प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक वरिष्ठ IPS अधिकारी का नाम शामिल है।

अब सभी की नजरें आने वाली सुनवाई और जांच प्रक्रिया पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और न्यायालय आगे क्या रुख अपनाता है।