CM सिद्धारमैया का इस्तीफा: नौ बार विधायक रहे, दो बार बने मुख्यमंत्री, जनता परिवार से कांग्रेस तक का लंबा राजनीतिक सफर
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को इस्तीफा दे दिया। उन्होंने बेंगलुरु में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा- मैंने पहले ही कहा था कि हाईकमान जब कहेगा, मैं इस्तीफा दे दूंगा। कल हाईकमान ने कहा और आज मैंने इस्तीफा दे दिया।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस्तीफे की घोषणा की है, जिससे राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. डीके शिवकुमार के समर्थक उनकी संभावित ताजपोशी की तैयारी में हैं.
कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। राज्य के मुख्यमंत्री Siddaramaiah ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे के साथ ही राज्य में सत्ता परिवर्तन की नई राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। 77 वर्षीय सिद्धारमैया कर्नाटक के सबसे अनुभवी और लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में से एक माने जाते हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे और जनता दल (जनता परिवार) से लेकर Indian National Congress तक का सफर तय किया।
सबसे लंबे कार्यकाल वाले नेताओं में शामिल
सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री के रूप में कुल 2,792 दिन पूरे कर लिए थे। इसी के साथ उन्होंने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवराज अर्स का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया। उनके लंबे कार्यकाल को राज्य की राजनीति में स्थिरता और जनकल्याणकारी नीतियों के दौर के रूप में देखा जाता है।
दो बार मुख्यमंत्री बनने का सफर
सिद्धारमैया पहली बार 2013 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने थे। उस कार्यकाल में उन्होंने अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया और कई सामाजिक योजनाओं को लागू किया। इसके बाद लगभग पांच वर्षों के अंतराल के बाद 2023 में वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। दूसरी बार सत्ता संभालने के बाद भी वह लगातार राज्य की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे।
उनके दूसरे कार्यकाल में कई जनकल्याण योजनाएं शुरू की गईं, जिनका उद्देश्य गरीब, पिछड़े और ग्रामीण क्षेत्रों तक सरकारी लाभ पहुंचाना था। हालांकि, उनके कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक संतुलन को लेकर कई बार विवाद भी सामने आए।
शुरुआती जीवन और शिक्षा
सिद्धारमैया का जन्म 12 अगस्त 1948 को मैसूर जिले के सिद्धारमनहुंडी गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, जिसने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।
उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक किया और बाद में कानून की डिग्री भी हासिल की। राजनीति में आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक वकालत भी की। धीरे-धीरे वे सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय होते गए।
राजनीति में शुरुआती कदम
सिद्धारमैया ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत तालुका बोर्ड सदस्य के रूप में की थी। 1983 में वे पहली बार चामुंडेश्वरी विधानसभा क्षेत्र से लोक दल के टिकट पर विधायक चुने गए। इसके बाद वे लगातार राजनीति में सक्रिय रहे और कुल नौ बार विधायक चुने गए।
वे लंबे समय तक जनता परिवार की विचारधारा से जुड़े रहे और कांग्रेस के विरोधी खेमे का हिस्सा माने जाते थे। वे समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया की विचारधारा से काफी प्रभावित थे।
जनता परिवार से कांग्रेस तक का सफर
रामकृष्ण हेगड़े सरकार के दौरान सिद्धारमैया ने राज्य में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने कन्नड़ कवलु समिति के पहले अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। बाद में वे रेशम उत्पादन मंत्री भी रहे।
2004 में जब कर्नाटक में कांग्रेस और जेडी(एस) की गठबंधन सरकार बनी, तब वे उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि, उन्हें मुख्यमंत्री न बन पाने का राजनीतिक मलाल भी लंबे समय तक रहा।
2005 में जनता दल (एस) से निकाले जाने के बाद उनके राजनीतिक जीवन में बड़ा मोड़ आया। इसके बाद उन्होंने नई पार्टी बनाने के बजाय 2006 में कांग्रेस का दामन थाम लिया। यह उनके लिए विचारधारा में बड़ा बदलाव था, क्योंकि वे लंबे समय तक कांग्रेस विरोधी राजनीति करते रहे थे।
कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने के लिए ‘अहिंदा’ आंदोलन को मजबूत किया। इसी सामाजिक समीकरण ने उन्हें कर्नाटक की राजनीति में एक मजबूत जनाधार प्रदान किया।
मुख्यमंत्री के रूप में उपलब्धियां और विवाद
2013 में मुख्यमंत्री बनने के बाद सिद्धारमैया ने कई जनकल्याणकारी योजनाएं लागू कीं। इन योजनाओं का उद्देश्य सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता को बढ़ावा देना था। ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में कई योजनाओं को आगे बढ़ाया गया।
हालांकि, उनके कार्यकाल पर कुछ विवाद भी जुड़े रहे। खासकर MUDA साइट आवंटन और प्रशासनिक फैसलों को लेकर विपक्ष ने कई बार सवाल उठाए। इन विवादों के बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार बना रहा।
डीके शिवकुमार के साथ सत्ता संतुलन की राजनीति
कर्नाटक कांग्रेस में लंबे समय से नेतृत्व परिवर्तन और सत्ता संतुलन की चर्चा चल रही थी। सिद्धारमैया और पार्टी के वरिष्ठ नेता DK Shivakumar के बीच नेतृत्व को लेकर राजनीतिक समीकरणों की चर्चा लगातार बनी रही।
कहा जाता है कि दोनों नेताओं के बीच संगठन और सत्ता पर प्रभाव को लेकर अंदरूनी प्रतिस्पर्धा भी रही है। इसी बीच कांग्रेस हाईकमान ने राज्य में नेतृत्व परिवर्तन का निर्णय लिया।
इस्तीफे के बाद राजनीतिक हलचल तेज
सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद बेंगलुरु में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। डीके शिवकुमार के आवास के बाहर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और बैरिकेडिंग की जा रही है। मीडिया और आम लोगों की आवाजाही को नियंत्रित किया गया है, जिससे राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई हैं।
अगला मुख्यमंत्री कौन?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व जल्द ही नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा कर सकता है। पार्टी संगठन और जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया जा सकता है।
फिलहाल पूरा राज्य इस बदलाव पर नजर बनाए हुए है। कांग्रेस की ओर से आधिकारिक घोषणा का इंतजार किया जा रहा है और राजनीतिक हलचल अपने चरम पर है।
सिद्धारमैया का राजनीतिक सफर भारतीय राजनीति में एक लंबे संघर्ष और अनुभव की कहानी है। एक किसान परिवार से निकलकर दो बार मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर कर्नाटक की राजनीति में महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। अब उनके इस्तीफे के बाद राज्य की राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंच गई है, जहां आने वाले दिनों में बड़ा नेतृत्व परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस