देश के 50 IAS-IPS अफसरों ने खरीदी जमीन, फिर मंजूर हुई ₹3200 करोड़ की सड़क, 5 करोड़ के प्लॉट का दाम अब 65 करोड़!

भोपाल के कोलार इलाके के गुराड़ी घाट गांव में देशभर के करीब 50 आईएएस और आईपीएस अफसरों ने एक ही दिन खेती की बेशकीमती जमीन खरीदी है। इस निवेश का खुलासा मध्य प्रदेश के आईएएस अफसरों के अचल संपत्ति विवरण (आईपीआर) की जांच में हुआ।

देश के 50 IAS-IPS अफसरों ने खरीदी जमीन, फिर मंजूर हुई ₹3200 करोड़ की सड़क, 5 करोड़ के प्लॉट का दाम अब 65 करोड़!

भोपाल में अफसरों की जमीन पर ‘सुनहरा खेल’?: 16 महीने में ₹5 करोड़ की जमीन बनी ₹65 करोड़ की संपत्ति

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से जमीन खरीद और सरकारी परियोजना को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला भोपाल के कोलार क्षेत्र स्थित गराड़ी घाट गांव का है, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से करीब 50 IAS और IPS अधिकारियों द्वारा एक ही दिन जमीन खरीदने और उसके कुछ ही समय बाद वहां ₹3200 करोड़ की सड़क परियोजना मंजूर होने की खबर ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में इन अधिकारियों ने गराड़ी घाट गांव में करीब 2.023 हेक्टेयर यानी लगभग 5 एकड़ कृषि भूमि खरीदी थी। खास बात यह रही कि जमीन की रजिस्ट्री एक ही दस्तावेज के जरिए की गई और उसमें जमीन को 50 हिस्सों में बांटकर खरीदा गया। हालांकि जांच में यह सामने आया कि इन 50 हिस्सों के पीछे वास्तविक खरीदारों की संख्या 41 थी। इन खरीदारों में केवल मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र, तेलंगाना, दिल्ली और हरियाणा कैडर के कई IAS और IPS अफसर भी शामिल बताए जा रहे हैं।

बताया गया कि 4 अप्रैल 2022 को यह जमीन करीब 5 करोड़ 50 लाख रुपए में खरीदी गई थी, जबकि उस समय इसकी बाजार कीमत लगभग 7 करोड़ 78 लाख रुपए आंकी गई थी। जमीन उस समय कृषि श्रेणी में थी और इसकी अनुमानित कीमत करीब 82 रुपए प्रति वर्ग फुट थी। लेकिन इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला।

जमीन खरीदने के करीब 16 महीने बाद, यानी 31 अगस्त 2023 को मध्य प्रदेश कैबिनेट ने ₹3200 करोड़ के ‘वेस्टर्न बायपास’ प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी। यह प्रस्तावित बायपास अधिकारियों द्वारा खरीदी गई जमीन से महज 500 मीटर की दूरी पर बताया जा रहा है। सड़क परियोजना की मंजूरी के बाद इलाके की जमीनों की कीमतों में अचानक भारी उछाल आ गया।

इसके बाद जून 2024 में उक्त कृषि भूमि का भूमि उपयोग बदलकर उसे आवासीय श्रेणी में परिवर्तित कर दिया गया। यही वह मोड़ था, जहां जमीन की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई। जो जमीन पहले करीब 82 रुपए प्रति वर्ग फुट थी, उसकी कीमत बढ़कर लगभग 557 रुपए प्रति वर्ग फुट पहुंच गई। इसके आधार पर जमीन की अनुमानित कीमत करीब 12 करोड़ रुपए तक जा पहुंची।

हालांकि मौजूदा बाजार दरों के अनुसार, अब इस इलाके में जमीन की कीमत 2500 से 3000 रुपए प्रति वर्ग फुट तक बताई जा रही है। इस हिसाब से वही जमीन अब लगभग 55 करोड़ से 65 करोड़ रुपए के बीच आंकी जा रही है। यानी करीब 16 महीने के भीतर निवेशकों को लगभग 11 गुना तक का फायदा हुआ।

इस पूरे मामले ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जमीन खरीदने वाले अधिकारियों को पहले से इस सड़क परियोजना की जानकारी थी? क्या यह निवेश सामान्य निवेश था या फिर सरकारी योजनाओं की अंदरूनी जानकारी के आधार पर किया गया सौदा? अगर ऐसा है, तो यह न केवल नैतिकता पर सवाल उठाता है बल्कि प्रशासनिक तंत्र में संभावित भ्रष्टाचार और हितों के टकराव की ओर भी संकेत करता है।

जांच में यह बात भी सामने आई है कि जिस जमीन को आवासीय घोषित किया गया, उसके लिए अभी तक कोई रजिस्टर्ड हाउसिंग सोसाइटी नहीं बनाई गई है। नियमों के अनुसार, किसी भी आवासीय विकास परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए जमीन को किसी पंजीकृत हाउसिंग सोसाइटी के नाम ट्रांसफर करना या प्लॉट्स का विधिवत आवंटन जरूरी होता है। ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया की वैधता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

यह पहला मामला नहीं है जब सरकारी परियोजनाओं और जमीन खरीद के बीच संबंधों को लेकर विवाद खड़ा हुआ हो। इससे पहले दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे परियोजना में भी अधिकारियों पर आरोप लगे थे कि उन्होंने अपने रिश्तेदारों के नाम पर किसानों से सस्ती जमीन खरीदी और बाद में सरकार को ऊंचे दामों पर बेचकर भारी मुनाफा कमाया। इसी तरह भारतमाला परियोजना के दौरान छत्तीसगढ़ में भी जमीन खरीद को लेकर विवाद सामने आया था।

भोपाल का यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इसमें देश की शीर्ष प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े अधिकारियों के नाम सामने आ रहे हैं। आम जनता के बीच यह धारणा बन रही है कि अगर सरकारी परियोजनाओं की जानकारी पहले से कुछ चुनिंदा लोगों तक पहुंचती है और वे उसका आर्थिक लाभ उठाते हैं, तो यह व्यवस्था की निष्पक्षता पर सीधा सवाल है।

फिलहाल इस मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। विपक्ष सरकार और प्रशासन से जवाब मांग रहा है, जबकि आम लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी और यदि कोई अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी या नहीं।

गराड़ी घाट गांव का यह मामला अब केवल जमीन खरीद का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, नैतिकता और सरकारी योजनाओं में संभावित अंदरूनी खेल को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बनता जा रहा है।