भगवान महावीर (वर्धमान) – बाल्यावस्था, खेल-कूद और दिव्य नामकरण
पर्युषण महोत्सव: भगवान महावीर के बाल्यावस्था से दीक्षा कल्याणक तक का प्रेरणादायी विवेचन
सूरत,बाड़मेर जैन श्री संघ सर्वमंगलमय वर्षावास में खरतरगच्छाचार्य संयम सारथी , शासन प्रभावक श्री जिनपीयूषसागर सूरीश्वर जी म.सा. के मंगलाचरण और मधुर कंठ से शासन गीत संगीत के साथ भगवान महावीर के जन्म के बाद कल्पसूत्र का विवेचन करते हुए भगवान वर्धमान के बाल्यकाल से महावीर नामकरण और दीक्षा कल्याणक तक का प्रवचन फरमाया ।
मुनि शाश्वत सागर जी ने कहा कि राजा सिद्धार्थ ने पुत्र जन्म के पश्चात राज्य में सुख-समृद्धि की वृद्धि देखकर उनका नाम वर्धमान रखा। बाल्यकाल में देवताओं ने उनकी परीक्षा ली और वज्र मुष्टि का प्रहार भी सहकर अडिग रहने पर उन्हें “महावीर” की उपाधि मिली।
युवावस्था में उनका विवाह यशोदा देवी के साथ हुआ और उनसे प्रियदर्शनी नामक कन्या का जन्म हुआ। वैवाहिक जीवन में भी महावीर भगवान का मन हमेशा धर्म और आत्मकल्याण की ओर अग्रसर रहा।
30 वर्ष की आयु में उन्होंने संसारिक बंधनों का त्याग कर दीक्षा ली और कठोर तपस्या एवं साधना में प्रवृत्त हुए। 12 वर्षों की घोर साधना के बाद उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई और वे 24वें तीर्थंकर बने।
मुनि समर्पित सागर ने कहा कि भगवान महावीर का जीवन हमें तीन अनमोल संदेश देता है—
• समृद्धि में भी विनम्रता,
• वैवाहिक जीवन में भी संयम और कर्तव्यपालन,
• और अंततः आत्मकल्याण हेतु त्याग व तपश्चर्या।
बाड़मेर जैन श्री संघ के वरिष्ठ सदस्य चम्पालाल बोथरा ने बताया की पर्युषण के आज छठे दिन कल्पसूत्र में भगवान महावीर के जन्म का नामकरण , बाल्यवस्था की खेल कूद क्रीड़ा ,
वैवाहिक जीवन ,
आत्म साधना ,केवल्य ज्ञान आदि का विवेचन श्रावक श्राविकों को सुनाया । आचार्य श्री के सानिध्य में तपस्या की बाहर आयी हुई है संघ ने सभी की साता पूछते हुए अनुमोदना की ।
भगवान महावीर आज भी मानवता के लिए शांति, करुणा और मोक्षमार्ग का अमिट दीपक हैं। मंदिर जी में भव्य आंगी की रचना , शाम को अंकित लोढ़ा ने भक्ति की रमझट को जमाया ।
संकलन :-
चम्पालाल बोथरा सूरत
9426157835
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस