मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: 60 दिन में जांच पूरी कर फैसला देगा स्क्रूटनी कमेटी

मध्यप्रदेश की मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मामले को हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी को सौंप दिया है। कोर्ट ने 60 दिन में जांच पूरी कर 30 जून 2026 तक फैसला देने के निर्देश दिए हैं।

मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: 60 दिन में जांच पूरी कर फैसला देगा स्क्रूटनी कमेटी

याचिका प्रदीप अहिरवार ने दायर की है, जिसमें आरोप है कि बागरी ने गलत तरीके से SC प्रमाण पत्र बनवाकर चुनाव जीता। अब कमेटी जांच कर प्रमाण पत्र की वैधता तय करेगी।

मध्यप्रदेश की नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर उठे विवाद ने अब एक अहम कानूनी मोड़ ले लिया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सीधे जांच कराने के बजाय मामले को हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी के पास भेजते हुए उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच कर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह कमेटी 60 दिनों के भीतर यह तय करेगी कि मंत्री का अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र वैध है या नहीं।

हाईकोर्ट का संतुलित रुख

इस पूरे मामले में हाईकोर्ट ने एक संतुलित और प्रक्रिया-आधारित दृष्टिकोण अपनाया है। कोर्ट ने न तो सीधे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी दिखाई और न ही आरोपों को नजरअंदाज किया। इसके बजाय अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों की जांच के लिए पहले से निर्धारित सक्षम प्राधिकरण—हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी—ही उचित मंच है।

डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता प्रदीप अहिरवार द्वारा 31 मार्च 2025 को दिए गए आवेदन के आधार पर कमेटी पूरी सुनवाई करेगी। साथ ही प्रतिवादी पक्ष, यानी मंत्री प्रतिमा बागरी को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।

60 दिन में फैसला, समयसीमा तय

हाईकोर्ट ने इस मामले में समयसीमा तय करते हुए निर्देश दिया है कि कमेटी 60 दिनों के भीतर जांच पूरी कर निर्णय दे। इसके अनुसार 30 जून 2026 तक अंतिम फैसला आ जाना चाहिए।

अदालत ने दोनों पक्षों को यह भी निर्देश दिया है कि वे 30 अप्रैल 2026 तक आदेश की प्रति स्पीड पोस्ट के माध्यम से संबंधित कमेटी को भेजें, ताकि समय पर कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

इसके अलावा कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि तय समयसीमा के भीतर कोई निर्णय नहीं लिया जाता है, तो याचिकाकर्ता को अपनी याचिका को दोबारा सक्रिय (रिवाइव) करने की स्वतंत्रता होगी।

कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाया मुद्दा

इस मामले की जानकारी भोपाल में कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दी गई। कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए कहा कि यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि आरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है।

उन्होंने आरोप लगाया कि यदि कोई व्यक्ति गलत तरीके से अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र बनवाकर लाभ लेता है, तो यह वास्तविक पात्र लोगों के अधिकारों का हनन है।

क्या है पूरा विवाद?

मामले की जड़ में वह आरोप है, जिसमें कहा गया है कि मंत्री प्रतिमा बागरी ने कथित रूप से गलत तरीके से अनुसूचित जाति (SC) का प्रमाण पत्र बनवाया और उसी आधार पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की।

याचिकाकर्ता का दावा है कि ‘बागरी’ जाति संबंधित क्षेत्र में अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं है। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि मंत्री वास्तव में राजपूत/ठाकुर समुदाय से संबंध रखती हैं, जिससे उनका SC प्रमाण पत्र संदेह के घेरे में आ जाता है।

दस्तावेजों का हवाला

याचिका में कई ऐतिहासिक और सरकारी दस्तावेजों का हवाला दिया गया है, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

1961 और 1971 की जातिगत जनगणना

2003 की राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति का निर्णय

2007 का केंद्र सरकार का राजपत्र

इन दस्तावेजों के आधार पर याचिकाकर्ता का कहना है कि ‘बागरी’ जाति को अनुसूचित जाति श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है, जिससे प्रमाण पत्र की वैधता पर सवाल उठते हैं।

पहले भी उठ चुका है मामला

यह पहला मौका नहीं है जब इस मुद्दे को अदालत में उठाया गया है। जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता ने पहले भी इसी विषय पर याचिका दायर की थी, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया गया था।

इस बार नए दस्तावेजों और तथ्यों के साथ मामला दोबारा प्रस्तुत किया गया है, जिसके चलते अदालत ने इसे गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं।

सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से पेश शासकीय अधिवक्ता ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि सक्षम प्राधिकारी यानी हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी इस मामले में नियमानुसार जांच करेगी।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि पहले इस विषय में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, तो अब निर्धारित प्रक्रिया के तहत सुनवाई कर उचित आदेश जारी किया जाएगा और इसकी जानकारी याचिकाकर्ता को दी जाएगी।

आगे क्या होगा?

अब इस पूरे मामले की दिशा और परिणाम काफी हद तक हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी की जांच पर निर्भर करेगा। कमेटी को यह तय करना होगा कि:

प्रस्तुत दस्तावेज कितने विश्वसनीय हैं

मंत्री का जाति प्रमाण पत्र किन आधारों पर जारी हुआ

क्या इसमें किसी प्रकार की अनियमितता या गलत जानकारी दी गई

यदि जांच में प्रमाण पत्र अमान्य पाया जाता है, तो इसके राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। वहीं यदि प्रमाण पत्र वैध साबित होता है, तो मंत्री को बड़ी राहत मिलेगी और विवाद खत्म हो सकता है।

राजनीतिक असर भी संभव

यह मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील है। एक ओर कांग्रेस इसे मुद्दा बनाकर सरकार पर निशाना साध रही है, तो दूसरी ओर सत्तारूढ़ पक्ष इस मामले में कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा जताते हुए प्रतिक्रिया देने से बच रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों का असर न केवल संबंधित नेता की छवि पर पड़ता है, बल्कि इससे आरक्षण व्यवस्था और जातिगत प्रमाण पत्रों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र से जुड़ा यह विवाद अब निर्णायक चरण में पहुंच चुका है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब सारी नजरें कास्ट स्क्रूटनी कमेटी की जांच और उसके फैसले पर टिकी हैं।

आने वाले 60 दिन न केवल इस मामले की सच्चाई सामने लाएंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि आरोपों में कितनी दम है और क्या वास्तव में नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं।