धीरेंद्र शास्त्री बोले- सेवादार लौंडियाबाजी के चक्कर में जुड़े, इनकी नजर सेवा पर नहीं, भौकाल पर है,वह छोड़ दें, वर्ना तुम्हारा पर्चा खोल देंगे
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने रविवार को दरबार में अपने सेवादारों और चेलों को जमकर फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि धाम की व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत है। कई सेवादारों का व्यवहार भक्तों के प्रति ठीक नहीं है। भक्तों को धक्का देते हैं। कुछ सेवादारों की भाषा और व्यवहार बहुत 'घटिया' है।
सेवा नहीं, ‘भौकाल’ के लिए जुड़े हो तो छोड़ दो – धीरेंद्र शास्त्री की चेतावनी, बोले: लौंडियाबाजी के चक्कर में आने वालों का पर्चा खोल देंगे
छतरपुर. बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने रविवार 8 मार्च को दरबार में अपने सेवादारों और चेलों को जमकर फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि धाम की व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत है। कई सेवादारों का व्यवहार भक्तों के प्रति ठीक नहीं है। भक्तों को धक्का देते हैं। कुछ सेवादारों की भाषा और व्यवहार बहुत घटिया है।
धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि कई सेवादार भक्तों से इस तरह पेश आते हैं, जैसे वे किसी सैन्य व्यवस्था में खड़े हों। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि चाय से ज्यादा तो केतली गरम हो रही है। उनका कहना था कि कई चेले उनके पीठ पीछे खुद को ही गुरु समझने लगे हैं।
शास्त्री ने कहा कि कई चेले हमसे सादगी नहीं सीख पा रहे हैं। इनकी नजर सेवा पर नहीं, बाबा के भौकाल पर है। इन्हें लगता है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से डायरेक्ट कनेक्शन है, इसलिए भौकाल है। सेवादारों को सेवा से नहीं, बल्कि गुरु के भौकाल से मतलब है।
माल-पानी, लौंडियाबाजी के चक्कर में बने सेवादार
दरबार के दौरान शास्त्री ने कहा कि कई लोग सेवा की भावना से नहीं, बल्कि अन्य कारणों से धाम से जुड़े हैं। आधे से ज्यादा सेवादार इसलिए बन गए, क्योंकि यहां ज्यादा माल-पानी है। कुछ लौंडे यहां लौंडियाबाजी के चक्कर में चेले बन गए। धाम में बालाजी की वजह से बच्चे-बच्चियां खिंचे चले आते हैं।
तुम्हारा भी पर्चा खोल देंगे
शास्त्री ने अपने चेलों को चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें सबकी सच्चाई पता है। उन्होंने कहा कि जो लोग उनके नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनका भी सच सामने आ सकता है। चेलों की स्थिति विचित्र हो गई है। हमसे मिले ही नहीं और सेवादार बन गए। आधे से ज्यादा सेवादार मेरे नाम से बन गए। हम दूसरों का पर्चा खोलते हैं, तो तुम्हारा भी पर्चा खोल देंगे।
सफलता की अपनी परिभाषा भी बताई दरबार के अंत में शास्त्री ने सफलता को लेकर अपनी सोच भी रखी। उन्होंने कहा कि धाम का नाम दुनिया में होना या बड़े नेताओं का यहां आना सफलता नहीं है। उनके मुताबिक असली सफलता यह है कि व्यक्ति का जीवन बिना किसी दाग के बीते और वह बेदाग रह सके।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस