करोड़ों के गबन पर बड़ी कार्रवाई, तत्कालीन बीईओ अशोक शर्मा की सेवा समाप्त -विभिन्न खातों से किया था फर्जीवाड़ा
शहडोल के बुढार ब्लॉक में 1 करोड़ 1 लाख 72 हजार रुपये की वित्तीय अनियमितता मामले में तत्कालीन प्रभारी BEO अशोक शर्मा को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. मामले में छात्रवृत्ति राशि के दुरुपयोग के आरोप भी शामिल हैं. जनजातीय कार्य विभाग ने जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह कार्रवाई की है.
शहडोल के तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी अशोक कुमार शर्मा को 1.01 करोड़ रुपये के गबन के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। उन्होंने 2014 से 2020 के बीच विभिन्न बैंक खातों के माध्यम से वित्तीय अनियमितताएं की थीं, जिसके बाद विभागीय कार्रवाई हुई।
भोपाल/शहडोल। मध्य प्रदेश शासन के जनजातीय कार्य विभाग ने वित्तीय अनियमितताओं और सरकारी धन के कथित गबन के मामले में बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए शहडोल जिले के बुढार के तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) अशोक कुमार शर्मा की शासकीय सेवा समाप्त कर दी है। विभाग द्वारा 23 जून 2026 को जारी आदेश में उन्हें मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमों के तहत पदच्युत करने का दंड दिया गया है। शासन की इस कार्रवाई को भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के खिलाफ सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
जानकारी के अनुसार अशोक कुमार शर्मा मूल रूप से व्याख्याता पद पर नियुक्त थे और बाद में विकासखंड शिक्षा अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे। उनके कार्यकाल के दौरान वर्ष 2014 से 2020 के बीच विभिन्न बैंक खातों के संचालन में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं। प्रारंभिक जांच में यह आरोप लगा कि उन्होंने अलग-अलग खातों के माध्यम से लगभग 1 करोड़ 1 लाख 72 हजार 176 रुपये की राशि का गबन किया।
मामले की शिकायत मिलने के बाद प्रशासन ने जांच शुरू की। जांच के दौरान कई दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन की पड़ताल की गई, जिसमें कथित रूप से सरकारी राशि के दुरुपयोग के संकेत मिले। इसके बाद बुढार थाने में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत अशोक शर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। मामला दर्ज होने के बाद शासन ने वर्ष 2021 में उन्हें निलंबित कर दिया था।
यह मामला केवल विभागीय स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायालय तक पहुंच गया। एफआईआर दर्ज होने के बाद उससे संबंधित कार्रवाई को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया गया। प्रारंभिक स्तर पर मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में हुई, जहां विभिन्न कानूनी पहलुओं पर विचार किया गया। बाद में राज्य शासन ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि एफआईआर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अंतिम आधार नहीं होती, बल्कि अपराध की सूचना और जांच की प्रक्रिया का प्रारंभिक चरण होती है। न्यायालय ने कहा कि आरोपों की निष्पक्ष और विस्तृत जांच होना आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी के बाद विभागीय जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई और मामले के विभिन्न पहलुओं की गहन समीक्षा की गई।
इसी क्रम में शहडोल संभाग के आयुक्त द्वारा वर्ष 2021 में अशोक कुमार शर्मा के खिलाफ सात बिंदुओं वाला आरोप पत्र जारी किया गया था। आरोप पत्र में विभिन्न बैंक खातों के संचालन, वित्तीय नियमों के उल्लंघन तथा सरकारी धन के कथित दुरुपयोग से जुड़े आरोप शामिल थे। विभागीय जांच अधिकारी ने उपलब्ध अभिलेखों, बैंक दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के बयानों के आधार पर विस्तृत जांच की।
जांच प्रतिवेदन शासन को सौंपे जाने के बाद जनजातीय कार्य विभाग ने पूरे मामले का परीक्षण किया। विभागीय स्तर पर उपलब्ध दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद आरोपों को गंभीर प्रकृति का माना गया। शासन ने यह निष्कर्ष निकाला कि संबंधित अधिकारी का आचरण शासकीय सेवा के मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया और उन पर लगे आरोप सेवा में बने रहने की पात्रता को प्रभावित करते हैं।
इन्हीं तथ्यों के आधार पर विभाग के प्रमुख सचिव द्वारा आदेश जारी करते हुए अशोक कुमार शर्मा को शासकीय सेवा से पदच्युत करने का निर्णय लिया गया। आदेश में कहा गया है कि उनके विरुद्ध सिद्ध हुई अनियमितताएं गंभीर हैं और ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई आवश्यक है ताकि प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि यह कार्रवाई केवल एक अधिकारी के खिलाफ दंडात्मक कदम नहीं है, बल्कि पूरे विभाग के लिए एक संदेश भी है। शासन लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि सरकारी योजनाओं और विभागीय कार्यों में उपयोग होने वाली सार्वजनिक धनराशि का पारदर्शी और नियमसम्मत उपयोग सुनिश्चित किया जाए। यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी विभागों में वित्तीय प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है। समय-समय पर ऑडिट, डिजिटल निगरानी और जवाबदेही की प्रभावी व्यवस्था ऐसे मामलों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अशोक शर्मा के मामले में की गई कार्रवाई इस दिशा में शासन की गंभीरता को दर्शाती है।
जनजातीय कार्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार शासन का उद्देश्य केवल दोषियों को दंडित करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों को रोकना भी है जिनसे सरकारी धन के दुरुपयोग की संभावना पैदा होती है। विभाग अब वित्तीय नियंत्रण तंत्र को और मजबूत करने की दिशा में भी कार्य कर रहा है।
इस कार्रवाई के बाद प्रशासनिक और शैक्षणिक हलकों में इसकी व्यापक चर्चा हो रही है। सरकारी कर्मचारियों के बीच भी यह संदेश गया है कि वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामलों में शासन अब किसी भी प्रकार की लापरवाही बरतने के पक्ष में नहीं है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में ऐसे मामलों में और भी सख्त निगरानी तथा त्वरित कार्रवाई देखने को मिल सकती है।
अशोक कुमार शर्मा की सेवा समाप्ति का यह मामला मध्य प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में उन प्रमुख उदाहरणों में शामिल हो गया है, जहां करोड़ों रुपये के कथित गबन और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बाद लंबी जांच प्रक्रिया के उपरांत शासन ने कठोर दंडात्मक कार्रवाई की है। शासन का कहना है कि सार्वजनिक धन की सुरक्षा और प्रशासनिक ईमानदारी बनाए रखना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है तथा भविष्य में भी भ्रष्टाचार और वित्तीय गड़बड़ियों के खिलाफ इसी प्रकार की सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस