सुर्खियां बनती महिलाओं की निजता, यह कैसी समग्र विकास की परिकल्पना

लेख में महिलाओं की निजता के बार-बार सुर्खियों में आने पर सवाल उठाया गया है। लेखक का तर्क है कि समग्र विकास की बात करने वाला समाज आज भी महिलाओं के शरीर, पहनावे और निजी मुद्दों को अनावश्यक चर्चा का विषय बनाता है, जबकि असल मुद्दे—जैसे शासन की नाकामियां, शिक्षा, स्वास्थ्य और समान अवसर—हाशिये पर चले जाते हैं।

सुर्खियां बनती महिलाओं की निजता, यह कैसी समग्र विकास की परिकल्पना

विकास शर्मा
सशक्त महिलाएं किसी भी उन्नत समाज के जीवन साक्ष्य होते हैं। महिलाओं की बेहतरी के काम को प्राथमिकता की सूची में सबसे ऊपर ही दर्ज किया गया है। समर्थ महिलाओं के बिना समग्र विकास की परिकल्पना ही अधूरी है। फिर भी हालिया घटनाक्रम में महिलाओं की निजता ही सुर्ख़ियों में क्यों रही, यह समाज के खोखलेपन और मानसिक बीमार होने की दास्तान बयां कर रहे हैं। हाल ही में एयरलाइंस विवाद और एकाधिकार के दुष्परिणाम के कारण परेशान हुई जनता के मामले में जहां सरकार की नाकामियों को उजागर होना था, लेकिन सुर्खियों में एक पिता का एयरपोर्ट पर रिसेप्शनिस्ट से अपनी बच्ची के लिए सेनेटरी पैड मांगना चर्चा में रहा। 
इसी तरह एक्ट्रेस गिरिजा ओक गोडबोले ने एक इंटरव्यू में बताया कि एक बार फिजिक्स क्लास के दौरान अपने प्रोफेसर द्वारा पूछे गए 'बेब्स' शब्द के बारे में बताया कि उन्होंने गलती से 'वेव्स' की जगह 'बेब्स' कह दिया था, और यह किस्सा इंटरनेट पर ट्रेंड करने लगा और नीली साड़ी में गिरिजा नेशनल क्रश बन गई। 
वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा महिला का हिजाब हटाना सुर्खियों में है और कई लोगों को नीतीश कुमार के इस कृत में कोई बुराई नजर ही नहीं आ रही। आखिर कब तक महिलाओं का शरीर और उनका पहनावा, यूं ही बेवजह सुर्खियों में रहेगा। 
दरअसल, निजता, महिलाओं को सशक्त बनाती है ताकि वे डर या शोषण के बिना शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक गतिविधियों में भाग ले सकें, लेकिन पुरुष प्रधान समाज ऐसा होते देखना चाहता ही नहीं है। 29 दिसंबर 1975 को ब्रिटेन ने लैंगिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया। इसी वर्ष सेक्स डिस्क्रिमिनेशन एक्ट लागू किया गया, जिसके तहत महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार प्रदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया गया। इस कानून का उद्देश्य शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना था। कानून के लागू होने के बाद नौकरी, वेतन, पदोन्नति और कार्यस्थल की शर्तों में महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर और अधिकार मिलने लगे। साथ ही, इसने समाज में महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने और उनके खिलाफ भेदभावपूर्ण व्यवहार को चुनौती देने का रास्ता खोला। यह कानून न केवल ब्रिटेन में महिला सशक्तिकरण की नींव बना, बल्कि दुनिया भर के कई देशों के लिए लैंगिक समानता से जुड़े कानूनों की प्रेरणा साबित हुआ। लेकिन 75 साल बाद भी हालात कुछ खास नहीं बदले हैं।
*(लेखक युवा पत्रकार हैं)*