गौशालाओं पर आर्थिक संकट की मार: छिंदवाड़ा–पांढुर्णा में महीनों से अटका अनुदान, बंद होने की कगार पर पहुंचीं व्यवस्थाएं
छिंदवाड़ा और पांढुर्णा जिलों की गौशालाएं गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रही हैं, क्योंकि पिछले 5 से 8 महीनों से सरकारी अनुदान राशि नहीं मिली है। इससे गौशालाओं में चारा-पानी और रखरखाव की व्यवस्था प्रभावित हो गई है। संचालक उधार और जनसहयोग के सहारे काम चला रहे हैं, लेकिन स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। गौसेवकों का आरोप है कि फाइलें अलग-अलग स्तरों पर अटकी हुई हैं और केवल आश्वासन मिल रहा है। यदि जल्द भुगतान नहीं हुआ तो कई गौशालाएं बंद होने की कगार पर पहुंच सकती हैं।
मनेश साहू | छिंदवाड़ा/पांढुर्णा।
छिंदवाड़ा–पांढुर्णा में गौशालाओं पर संकट गहराया, 5 से 8 माह से अनुदान अटका; संचालन ठप होने की आशंका
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गौसंरक्षण और गौशालाओं को मजबूत करने के दावे भले ही बड़े स्तर पर किए जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री द्वारा प्रति गाय अनुदान राशि 20 रुपए से बढ़ाकर 40 रुपए किए जाने की घोषणा के बाद भी प्रदेश की कई गौशालाएं आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। खासकर छिंदवाड़ा और पांढुर्णा जिले की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
छिंदवाड़ा जिले की गौशालाओं को पिछले लगभग आठ माह से अनुदान राशि प्राप्त नहीं हुई है, जबकि पांढुर्णा जिले में भी करीब पांच माह से भुगतान लंबित बताया जा रहा है। सबसे गंभीर बात यह है कि यह वही समय है जब गौशालाओं में वर्षभर के लिए चारा और भूसा भंडारण किया जाता है। ऐसे समय में अनुदान राशि न मिलना कई सवाल खड़े कर रहा है।
अनुदान के अभाव में गौशाला संचालकों को रोजमर्रा की व्यवस्थाएं संभालना मुश्किल हो गया है। कई संचालक उधार लेकर गौवंश के लिए चारा-पानी की व्यवस्था कर रहे हैं, तो कई जगह जनसहयोग के भरोसे संचालन चल रहा है। लगातार बढ़ते खर्च और भुगतान में देरी के कारण अब गौशालाओं की व्यवस्थाएं धीरे-धीरे चरमराने लगी हैं।
गौशाला संचालकों का आरोप है कि वे पिछले कई महीनों से जिला कलेक्टर, पशु चिकित्सा विभाग, जिला पंचायत और जनपद पंचायत कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही दिया जाता है। अधिकारियों द्वारा कभी फाइल लंबित होने, कभी अनुमोदन बाकी होने तो कभी बजट जारी न होने का हवाला देकर मामला टाल दिया जाता है।
मात्र कृपा गौशाला तिगांव-कामठ के गौसेवक संजीव राऊत ने बताया कि पशु विभाग की लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता के कारण आठ माह से भुगतान नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि कभी जिला कलेक्टर की अनुमति, कभी जिला पंचायत सीईओ तो कभी जनपद स्तर पर फाइल अटकने की बात कही जाती है, लेकिन समाधान आज तक नहीं निकला।
संचालकों का कहना है कि यदि जल्द अनुदान राशि जारी नहीं हुई तो कई गौशालाओं के सामने ताला लगाने की नौबत आ सकती है। पहले भी आर्थिक तंगी के चलते कई गौशालाएं बंद हो चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब सरकार गौसंरक्षण को प्राथमिकता बताती है, तो फिर गौशालाओं को समय पर अनुदान क्यों नहीं मिल पा रहा?
गौसेवकों और सामाजिक संगठनों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि लंबित अनुदान राशि तत्काल जारी कर गौशालाओं को राहत दी जाए, ताकि गौवंश के संरक्षण और व्यवस्थाओं को बचाया जा सके।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस