33 साल बाद भी हक की लड़ाई, न घर मिला, न कब्‍जा : फाइलों में दबा इंसाफ : 1992 की लॉटरी 2026 में भी अधूरी, प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ी दीनदयाल आवास योजना

भोपाल की पंडित दीनदयाल पुरम आवासीय योजना (1992–93) में हुए एक गंभीर प्रशासनिक प्रकरण में लॉटरी से आवंटित मकान का न तो कब्ज़ा मिला और न ही मालिकाना हक

33 साल बाद भी हक की लड़ाई, न घर मिला, न कब्‍जा : फाइलों में दबा इंसाफ : 1992 की लॉटरी 2026 में भी अधूरी, प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ी दीनदयाल आवास योजना

लॉटरी से मिला घर, ज़मीन पर कभी दिखा ही नहीं

पूरी रकम जमा, फिर भी 33 साल तक कब्ज़े का इंतज़ार

भोपाल।सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत कितनी भयावह हो सकती है, इसका उदाहरण पंडित दीनदयाल पुरम आवासीय योजना (1992–93) का यह प्रकरण है, जहाँ लॉटरी से आवंटित भवन का आधिपत्य पाने के लिए एक वरिष्ठ नागरिक तीन दशक से अधिक समय से भटकते हुए इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन प्रशासनिक तंत्र आज तक कोई ठोस निर्णय नहीं ले सका। राजधानी निवासी श्रीमती चन्‍द्रकांति आर्य के पति स्‍व. एस. के. आर्य, जिन्हें वर्ष 1992–93 में विशेष क्षेत्र प्राधिकरण (साडा), मंडीदीप द्वारा लॉटरी प्रणाली से आवास आवंटित किया गया था, ने नियमानुसार पूरी राशि जमा की। इसके बावजूद उन्हें आज तक न तो भवन का कब्‍जा मिला और न ही मालिकाना हक। 

क्या सरकारी आवासीय योजनाएँ वास्तव में गरीब और मध्यम वर्ग के लिए होती हैं, या फिर वे सिर्फ फाइलों और अधिकारियों के लिए बनाई जाती हैं? पंडित दीनदयाल पुरम आवासीय योजना (1992–93) का यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था के उस काले सच को उजागर करता है, जिसमें लॉटरी से आवंटित घर जमीन पर कभी बने ही नहीं लेकिन उसी जमीन पर बाद में दुकानों और भवनों की बिक्री होती रही। पंडित दीनदयाल पुरम आवासीय योजना के अंतर्गत वर्ष 1992–93 में किए गए आवास आवंटन से जुड़ा यह प्रकरण इन दिनों शासन-प्रशासन के समक्ष गंभीर चुनौती के रूप में उभर कर सामने आया है। लगभग तीन दशक बीत जाने के बावजूद लॉटरी प्रणाली से आवंटित भवन का आधिपत्य और मालिकाना हक न मिल पाने को लेकर अब इस मामले में सीबीआई अथवा लोकायुक्त से जांच कराए जाने की मांग तेज हो गई है।

फाइलें चलीं, अधिकारी बदले… पर न्याय नहीं मिला 

वर्ष 1992–93 में विशेष क्षेत्र प्राधिकरण (साडा), मंडीदीप ने विधिवत लॉटरी प्रक्रिया से आवास आवंटन किया। हितग्राही एस. के. आर्य ने निर्धारित राशि भी जमा कर दी। इसके बाद जो हुआ, वह किसी एक अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की कहानी है। साडा खत्म हो गया, फाइलें इधर-उधर होती रहीं, अधिकारी बदलते रहे पर न स्सिटम बदला और न आवंटित मकान कभी नहीं मिला। साडा के अस्तित्व में न रहने के बाद उसके सभी दायित्व नगरीय निकायों को हस्तांतरित हो गए। हैरानी की बात यह है कि जिस भूमि पर हितग्राहियों को आवास मिलना था, उसी भूमि पर आज नगर निगम द्वारा भवन और दुकानें बनाकर बेची जा रही हैं, लेकिन वास्तविक हितग्राही आज भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है। यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही से आगे बढ़कर अधिकारों के संभावित हनन और वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करती है

साडा के विघटन के बाद जिम्मेदारी तय नहीं :

विशेष क्षेत्र प्राधिकरण (साडा) के विघटन के बाद उसके दायित्व संबंधित नगरीय निकायों को हस्तांतरित हुए, किंतु आवंटनों के भविष्य को लेकर न तो समयबद्ध निर्णय लिया गया और न ही हितग्राहियों को वैकल्पिक व्यवस्था प्रदान की गई। परिणामस्वरूप हितग्राही तीन दशकों से प्रशासनिक अनिर्णय का शिकार बने हुए हैं। इस दौरान कलेक्टर भोपाल, नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय तथा नगर पालिका परिषद मंडीदीप के मध्य कई बार पत्राचार हुआ। अपर आयुक्त सह मिशन संचालक नगरीय प्रशासन एवं विकास द्वारा निर्धारित समय-सीमा में प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए, परंतु आज दिनांक तक न तो कोई प्रतिवेदन सार्वजनिक हुआ और न ही किसी अधिकारी की जवाबदेही तय की गई।

प्रशासनिक कानून के जानकारों का कहना है कि यदि आवंटन वैध था और हितग्राही द्वारा राशि जमा की जा चुकी थी, तो या तो तत्काल आधिपत्य दिया जाना चाहिए था अथवा नियमानुसार वैकल्पिक आवंटन अथवा मुआवजे का निर्णय लिया जाना चाहिए था। वर्षों तक निर्णय लंबित रहना प्रशासनिक अनिर्णय के साथ-साथ संभावित कदाचार की श्रेणी में भी आता है, जिसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक मानी जाती है।

क्या कहते हैं दस्तावेज :

दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1992–93 में विशेष क्षेत्र प्राधिकरण (साडा), मंडीदीप द्वारा पंडित दीनदयाल पुरम आवासीय योजना अंतर्गत लॉटरी प्रणाली से आवास आवंटन किया गया था और हितग्राहियों से निर्धारित राशि जमा कराई गई थी। कलेक्टर जिला भोपाल द्वारा वर्ष 2024 में नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय को भेजे गए पत्र में इस तथ्य की पुष्टि की गई है कि योजना से संबंधित भूमि शासकीय है और प्रकरण परीक्षणाधीन है। संचालनालय नगरीय प्रशासन एवं विकास द्वारा फरवरी और मार्च 2024 में संबंधित नगरीय निकायों को प्रकरण का परीक्षण कर नियमानुसार कार्यवाही करने तथा प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए। इसके बावजूद, अक्टूबर 2024 में अपर आयुक्त सह मिशन संचालक द्वारा पुनः स्मरण पत्र जारी कर यह उल्लेख किया गया कि अब तक कोई प्रतिवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। 

दस्तावेज यह भी दर्शाते हैं कि जिस खसरा भूमि पर उक्त आवासीय योजना प्रस्तावित थी, उस पर बाद के वर्षों में नगरीय निकाय द्वारा निर्माण कार्य कराए गए। हालांकि, इन निर्माणों से पूर्व पूर्ववर्ती आवंटनों के निराकरण या हितग्राहियों को वैकल्पिक व्यवस्था दिए जाने का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। हितग्राहियों के पास योजना से जुड़े 377 आवंटनों के अभिलेख उपलब्ध होने का दावा किया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि मामला किसी एक व्यक्ति तक सीमित न होकर सामूहिक अधिकारों और प्रशासनिक निर्णय-प्रक्रिया से जुड़ा है।

*प्रशासनिक पत्राचार भी बेअसर :*

कलेक्टर भोपाल, संचालनालय नगरीय प्रशासन एवं विकास तथा नगर पालिका परिषद मंडीदीप के बीच कई बार पत्राचार हुआ। यहाँ तक कि अपर आयुक्त सह मिशन संचालक नगरीय प्रशासन द्वारा तीन दिन में कार्यवाही कर प्रतिवेदन भेजने के निर्देश भी दिए गए, लेकिन आज तक न कोई रिपोर्ट आई, न कोई समाधान निकला। 

*377 हितग्राही, लेकिन किसी की जिम्मेदारी तय नहीं :*

इस योजना से जुड़े 377 हितग्राहियों के दस्तावेज उपलब्ध होने के बावजूद, न तो किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हुई और न ही वर्षों से लंबित प्रकरण का निराकरण किया गया। यह स्थिति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करती है। वरिष्ठ नागरिक स्‍व श्री आर्य की धर्मपत्‍नी श्रीमती चन्‍द्रकांति आर्य ने बताया कि उनके पति ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई, लेकिन नीचे का प्रशासनिक तंत्र अब भी मौन है। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी योजना का लाभ केवल कागज़ों तक सीमित है? क्या आवास योजना में घर पाने के लिए जीवन का आधा हिस्सा इंतजार में ही निकल जाना चाहिए ? और क्या वरिष्ठ नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार ही “सुशासन” की पहचान है? सामाजिक संगठनों और हितग्राहियों का कहना है कि मामले की निष्पक्षता बनाए रखने और सभी तथ्यों को सामने लाने के लिए इसकी जांच सीबीआई अथवा राज्य लोकायुक्त जैसे स्वतंत्र संवैधानिक संस्थान से कराई जानी चाहिए। फिलहाल इस प्रकरण पर सरकार की ओर से अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा की जा रही है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन इस मामले को एक लंबित फाइल मानकर छोड़ देता है या फिर उच्चस्तरीय जांच के माध्यम से वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे हितग्राहियों को न्याय दिलाने की दिशा में ठोस पहल करता है।

*मामले में क्या कहता है कानून :*

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी शासकीय आवासीय योजना के अंतर्गत विधिवत प्रक्रिया से आवंटन किया गया हो और हितग्राही द्वारा निर्धारित राशि जमा कर दी गई हो, तो संबंधित प्राधिकरण पर आवंटित संपत्ति का आधिपत्य प्रदान करने का वैधानिक दायित्व बनता है। आवंटन के उपरांत लंबे समय तक आधिपत्य न देना प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि सेवा में त्रुटि और अधिकारों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। नगर नियोजन और नगरीय प्रशासन से संबंधित विधिक प्रावधानों के अनुसार, किसी विशेष क्षेत्र प्राधिकरण के विघटन की स्थिति में उसके अधिकार, दायित्व और लंबित प्रकरण उत्तरवर्ती निकाय को स्थानांतरित हो जाते हैं। ऐसे मामलों में पूर्व में किए गए वैध आवंटन स्वतः समाप्त नहीं होते और उन्हें विधिवत आदेश के बिना निरस्त नहीं किया जा सकता।

कानून यह भी स्पष्ट करता है कि जिस भूमि पर वैध आवंटन अस्तित्व में हों, उस भूमि के उपयोग में परिवर्तन अथवा पुनः विक्रय तभी संभव है, जब पूर्व आवंटनों का निराकरण विधिसम्मत प्रक्रिया से किया गया हो और प्रभावित हितग्राहियों को वैकल्पिक व्यवस्था अथवा प्रतिकर प्रदान किया गया हो। इसके अभाव में की गई कोई भी बिक्री न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है। प्रशासनिक कानून विशेषज्ञों का कहना है कि दशकों तक किसी प्रकरण को लंबित रखना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्रदत्त समानता और सम्मानजनक जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि अनिश्चितकालीन देरी स्वयं में एक अन्याय है। यह मामला अब केवल एक आवंटन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, संवेदनहीनता और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बन चुका है। यदि शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो यह प्रकरण शासन की नीतियों और नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता रहेगा।