चंदन सी महक — राष्ट्र चेतना की अमर सुगंध अनुभूती,पद्मश्री से अलंकृत, सेवा और साधना से राष्ट्र को महकाने वाली एक दिव्य प्रेरणा
यह लेख पद्मश्री डॉ. आचार्यश्री चंदना जी (ताई माँ) को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है, जिसमें उनके सेवा, साधना और राष्ट्र निर्माण के अद्वितीय योगदान को रेखांकित किया गया है। बिहार से प्रारंभ हुए उनके तपस्वी जीवन ने वीरायतन जैसे वैश्विक सेवा आंदोलन का रूप लिया, जिसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में लाखों लोगों का जीवन बदला। उनका जीवन “चंदन” की तरह था—जितना समर्पण, उतनी ही सुगंध। लेख में उनके व्यक्तित्व को सेवा, शिक्षा, साधना और प्रेरणा के चार स्तंभों में प्रस्तुत करते हुए उन्हें राष्ट्र चेतना की जीवंत प्रतीक बताया गया है।
चंदन सी महक — एक प्रेरक श्रद्धांजलि
ताई माँ का जीवन: सेवा, साधना और समर्पण की दिव्य यात्रा
प्रारंभिक जीवन और वैराग्य का मार्ग
सूरत -परम पूज्य पद्मश्री डॉ. आचार्यश्री चंदना जी म. सा. (ताई माँ) को समर्पित यह श्रद्धांजलि केवल स्मरण नहीं, बल्कि एक जीवित चेतना का अनुभव है। उनका निर्वाण अंत नहीं, बल्कि उस दिव्य ऊर्जा का विस्तार है, जो हर उस कर्म में प्रकट होती है जो सेवा, करुणा और मानवता के लिए किया जाता है।
चंदन का स्वभाव है—जितना घिसे, उतना महके। ताई माँ का जीवन भी इसी सत्य का प्रतीक था। उनका प्रत्येक क्षण समर्पण से भरा था, और उसी समर्पण ने उनके व्यक्तित्व को ऐसी सुगंध दी, जो आज भी असंख्य जीवनों में अनुभव की जा सकती है। वे केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक अनुभूति हैं—जितनी बाँटी जाए, उतनी ही गहरी होती जाती है।
प्रारंभिक जीवन एवं प्रारंभिक कार्यकाल :
आचार्य श्री चंदना जी का प्रारंभिक जीवन अत्यंत संवेदनशीलता और आत्मबल से भरा रहा। बिहार की धरती पर जन्म लेकर उन्होंने किशोरावस्था में ही वैराग्य का मार्ग अपनाया और जैन दीक्षा ग्रहण कर तप, त्याग और अनुशासन से अपने व्यक्तित्व को साधा। प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने ग्रामीण और उपेक्षित क्षेत्रों में पदयात्रा कर समाज की वास्तविक पीड़ा को निकट से अनुभव किया। विशेष रूप से 1970 के दशक में राजगीर क्षेत्र में उन्होंने भूख, बीमारी और अशिक्षा से जूझ रहे लोगों के बीच सेवा कार्य प्रारंभ किए। यही वह दौर था जब उन्होंने यह संकल्प लिया कि धर्म केवल साधना तक सीमित न रहकर सेवा के माध्यम से समाज में उतरे—और इसी संकल्प से आगे चलकर वीरायतन की स्थापना हुई, जिसने उनके जीवन को एक मिशन में परिवर्तित कर दिया।
वैश्विक विस्तार एवं प्रकल्पों का व्यापक प्रभाव:
आज वीरायतन एक वैश्विक सेवा आंदोलन के रूप में विकसित हो चुका है, जिसके भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, केन्या जैसे देशों में केंद्र सक्रिय हैं। इसके अंतर्गत 70+ से अधिक सेवा प्रकल्प संचालित हो रहे हैं, जिनमें 50,000 से अधिक विद्यार्थियों को शिक्षा, लाखों रोगियों को निःशुल्क या सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ, और हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के कार्यक्रम शामिल हैं। नेत्र चिकित्सा शिविरों के माध्यम से लाखों लोगों को दृष्टि प्रदान की गई है, वहीं आपदा राहत कार्यों में भी संस्था ने राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
राष्ट्रीय सम्मान से राष्ट्र चेतना तक — ताई माँ का गौरवशाली योगदान
भारत सरकार ने उनके अतुलनीय कार्यों के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। वे पहली ऐसी जैन आचार्य बनीं, जिनके निर्वाण को महाराष्ट्र शासन द्वारा एक गौरवशाली ‘निर्वाण महोत्सव’ के रूप में मान्यता मिली—जो आगे चलकर राष्ट्र चेतना का महा उत्सव बनकर एक सुनहरा इतिहास बन गया।
ताई माँ के जीवन के चार प्रमुख आयाम रहे—सेवा, शिक्षा, साधना और प्रेरणा—जो एक संपूर्ण जीवन-दर्शन को व्यक्त करते हैं।
मेरे लिए ताई माँ का सान्निध्य एक आंतरिक जागरण था। उन्होंने मुझे जीवन का स्पष्ट उद्देश्य और सही दिशा दी। उनके मार्गदर्शन ने मेरे भीतर उस आत्मीय विस्तार का बोध कराया, जिसने मेरे जीवन को अर्थपूर्ण बनाया और राष्ट्र चेतना से जोड़ा।
प्रिय आत्मन ताई माँ,
आपका जीवन हमारा पथ है,
आपकी प्रेरणा हमारी शक्ति है,
और आपकी सुगंध हमारी पहचान है।
चंदन की तरह जियो… सुगंध अपने आप महकेगी…
जय जिनेन्द्र
सुश्री. रोशनी जैन
Community Media Architect & Strategy Consultant
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस