भाजपा विधायक चिंतामणि मालवीय ने अपनी ही सरकार की व्यवस्था पर उठाए सवाल,जनता नहीं, नौकरशाही बन गई है सत्ता का केंद्र” बोले- IAS इतने पावरफुल क्यों?

मध्यप्रदेश के रतलाम जिले की आलोट सीट से भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने अपनी ही सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।

भाजपा विधायक चिंतामणि मालवीय ने अपनी ही सरकार की व्यवस्था पर उठाए सवाल,जनता नहीं, नौकरशाही बन गई है सत्ता का केंद्र” बोले- IAS इतने पावरफुल क्यों?

आलोट से भाजपा विधायक Chintamani Malviya डॉ. चिंतामणि मालवीय ने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में मध्यप्रदेश की नौकरशाही पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में शक्ति का केंद्र जनता या जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि आईएएस अधिकारी बन गए हैं। उन्होंने कलेक्टर और अन्य अधिकारियों के पास अत्यधिक अधिकार होने पर चिंता जताई और प्रशासनिक ढांचे में बड़े सुधार की मांग की।

रतलाम। मध्यप्रदेश की राजनीति में उस समय नई बहस छिड़ गई जब आलोट से भाजपा विधायक Chintamani Malviya डॉ. चिंतामणि मालवीय ने अपनी ही सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए। सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में उन्होंने कहा कि प्रदेश में लोकतंत्र का वास्तविक शक्ति केंद्र जनता या जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि नौकरशाही बनती जा रही है। उन्होंने प्रशासनिक ढांचे में व्यापक सुधार और पुनर्गठन की मांग करते हुए कहा कि वर्तमान व्यवस्था में आईएएस अधिकारियों के पास अत्यधिक शक्तियां केंद्रित हो गई हैं, जिससे जनप्रतिनिधियों की भूमिका कमजोर पड़ रही है।

डॉ. मालवीय ने कहा कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को निर्णय प्रक्रिया में प्रमुख स्थान मिलना चाहिए, लेकिन व्यवहारिक रूप से ऐसा दिखाई नहीं देता। उनके अनुसार राज्य की कार्यपालिका के पास इतनी अधिक शक्तियां हैं कि शक्ति संतुलन प्रभावित हो रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्यों है कि आईएएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं, जबकि जनप्रतिनिधियों को कई बार अपनी बात रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

उन्होंने प्रशासनिक ढांचे की आलोचना करते हुए कहा कि एक कलेक्टर के पास कानून-व्यवस्था, राजस्व, भू-प्रबंधन, आपदा प्रबंधन, विकास कार्यों की निगरानी और मजिस्ट्रेट संबंधी अधिकार जैसे अनेक महत्वपूर्ण दायित्व होते हैं। इतनी अधिक शक्तियां एक ही अधिकारी के पास होने से जवाबदेही और संतुलन की स्थिति प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था धीरे-धीरे अप्रत्यक्ष रूप से कॉर्पोरेट मॉडल जैसी दिखाई देने लगी है, जहां निर्णय लेने की शक्ति सीमित लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाती है।

मालवीय ने अपने आरोपों को पुष्ट करने के लिए कुछ घटनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मंदसौर में महापौर रमा देवी गुर्जर, भाजपा जिला अध्यक्ष और अन्य पार्टी पदाधिकारी कलेक्टर से मिलने पहुंचे थे। उन्हें लगभग एक घंटे तक इंतजार करना पड़ा और बाद में कलेक्टर ने उन्हें अपने चैंबर में बुलाने के बजाय बाहर ही मुलाकात की। विधायक ने इसे जनप्रतिनिधियों और जनता के प्रति सम्मान की कमी का उदाहरण बताया।

इसी प्रकार उन्होंने रतलाम जिला पंचायत अध्यक्ष लाला बाई का मामला भी उठाया। उनके अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष अपने पति के साथ कलेक्टर से मिलने पहुंची थीं, लेकिन लंबे समय तक प्रतीक्षा के बावजूद उन्हें मुलाकात का अवसर नहीं मिला। इसके विरोध में उन्हें कलेक्टर कार्यालय की सीढ़ियों पर बैठकर धरना देना पड़ा। मालवीय का कहना है कि यदि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी इस प्रकार की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है तो आम जनता की परेशानियों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

विधायक ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री Himmat Kothari हिम्मत कोठारी का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें एक मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस अधीक्षक कार्यालय में फर्श पर बैठकर धरना देना पड़ा था। तब जाकर उनकी रिपोर्ट दर्ज की गई। उन्होंने कहा कि यह स्थिति प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

अपने वीडियो में उन्होंने भिंड जिले में विधायक Narendra Singh Kushwah नरेंद्र सिंह कुशवाह और कलेक्टर Sanjeev Shrivastava संजीव श्रीवास्तव के बीच हुए विवाद का भी उल्लेख किया। मालवीय ने इसे नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ते टकराव का उदाहरण बताया। उनका कहना था कि इस तरह की घटनाएं संकेत देती हैं कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय की आवश्यकता है।

नौकरशाही में भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाते हुए डॉ. मालवीय ने एक गंभीर आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2022 में भोपाल के बुराड़ी घाट क्षेत्र में विभिन्न राज्यों के लगभग 50 आईएएस और कुछ आईपीएस अधिकारियों ने एक ही दिन में करीब 11 बीघा जमीन खरीदी थी। उनके अनुसार लगभग दस महीने बाद उसी क्षेत्र से 3,200 करोड़ रुपये की लागत वाले वेस्टर्न कॉरिडोर रोड की योजना निकाली गई, जिसके कारण जमीनों की कीमतों में कई गुना वृद्धि हुई।

उन्होंने कहा कि यह मामला सार्वजनिक चर्चा में आने के बावजूद किसी प्रकार की प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। मालवीय ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ पूर्व मुख्य सचिवों और वरिष्ठ अधिकारियों ने भोपाल के लो-डेंसिटी कैचमेंट एरिया में भी जमीनें खरीदीं, जहां नियमों के बावजूद मकानों और सड़कों का विकास किया गया। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच हो तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

प्रशासनिक ढांचे पर टिप्पणी करते हुए विधायक ने कहा कि केंद्र सरकार में कैबिनेट सेक्रेटरी के बाद प्रत्येक विभाग में एक सचिव होता है, जबकि राज्यों में मुख्य सचिव के अलावा अनेक अतिरिक्त मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव नियुक्त किए जाते हैं। कई बार एक ही अधिकारी के पास पांच से सात विभागों की जिम्मेदारी होती है, जबकि मंत्री केवल एक विभाग संभालते हैं। इससे अधिकारियों का प्रभाव स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है और जनप्रतिनिधियों की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है।

डॉ. मालवीय ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका सहित कई देशों में भारत जैसी कलेक्टर व्यवस्था नहीं है। उनके अनुसार भारत की यह प्रणाली ब्रिटिश शासनकाल की देन है, जिसे उस समय प्रशासनिक नियंत्रण के उद्देश्य से विकसित किया गया था। उन्होंने कहा कि बदलते समय में इस व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक है ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को और मजबूत बनाया जा सके।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल सूची में विधायक और महापौर का स्थान मुख्य सचिव से ऊपर होता है, जबकि कलेक्टर उनसे काफी नीचे आते हैं। इसके बावजूद व्यवहारिक स्तर पर कई बार जनप्रतिनिधियों को अपेक्षित सम्मान और प्राथमिकता नहीं मिलती। यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।

अपने बयान के अंत में भाजपा विधायक ने प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में शक्ति का संतुलन बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि निर्णय लेने की शक्ति अत्यधिक रूप से नौकरशाही के हाथों में केंद्रित हो जाती है तो जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की प्रभावशीलता कम हो सकती है। उन्होंने सरकार से प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा करने, जवाबदेही बढ़ाने और जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों के बीच संतुलित व्यवस्था विकसित करने की मांग की।

डॉ. चिंतामणि मालवीय का यह बयान अब राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। विपक्ष जहां इसे सरकार के भीतर की असंतुष्टि के रूप में देख रहा है, वहीं राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकतंत्र में नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर शुरू हुई एक महत्वपूर्ण बहस मान रहे हैं।