TMC में बगावत से मचा सियासी भूचाल, ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने का दावा; पार्टी तीन हिस्सों में बंटी
TMC के बागी सांसदों ने ममता बनर्जी को पद से हटा दिया है। उनकी जगह विधायक अरूप रॉय को अपना अध्यक्ष चुना है। वहीं, अभिषेक बनर्जी को सस्पेंड कर दिया गया है।
पश्चिम बंगाल में 58 टीएमसी विधायकों की बगावत के बाद विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने अरूप रॉय को पार्टी का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से पार्टी की मेंटर की भूमिका निभाने का आग्रह किया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर लंबे समय से चल रहा सत्ता संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने खुद को “असली टीएमसी” बताते हुए पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाने का दावा किया है। इतना ही नहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेता Abhishek Banerjee को भी निलंबित करने की घोषणा की गई है। बागी गुट ने हावड़ा मध्य से विधायक Arup Roy को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त करने का ऐलान किया है।
न्यू टाउन के एक होटल में आयोजित विशेष बैठक में ऋतब्रत बनर्जी गुट ने दावा किया कि इसमें 60 विधायक और कोलकाता नगर निगम के 70 पार्षद शामिल हुए। बैठक में पार्टी संगठन पर नियंत्रण को लेकर कई अहम फैसले लिए गए। बागी गुट का कहना है कि पार्टी संविधान के तहत यह विशेष सत्र बुलाया गया था और इसमें सर्वसम्मति से अरूप रॉय को अध्यक्ष चुना गया।
बैठक के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि नई नेतृत्व टीम जल्द ही जिला समितियों, प्रदेश इकाई और प्रवक्ताओं के पैनल का गठन करेगी। साथ ही उन्होंने नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा करते हुए अरूप बिस्वास, फिरहाद हकीम, रथिन घोष और सबीना यास्मीन को उपाध्यक्ष बनाया। वहीं ऋतब्रत बनर्जी, जावेद खान और संदीपन साहा को महासचिव तथा अखरुज्जमां अंसारी को कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया।
बागी गुट ने यह भी दावा किया कि उनकी पूरी प्रक्रिया पार्टी संविधान के अनुरूप हुई है और बैठक की कार्यवाही निर्वाचन आयोग को भेजी जाएगी। ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि असली और नकली टीएमसी का फैसला अब निर्वाचन आयोग करेगा। उन्होंने ममता बनर्जी के प्रति नरम रुख दिखाते हुए कहा कि यदि वे चाहें तो उन्हें पार्टी का मुख्य सलाहकार बनाया जा सकता है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद टीएमसी के भीतर असंतोष बढ़ता जा रहा है। बागी गुट का दावा है कि पार्टी के अधिकांश विधायकों ने विधानसभा में विपक्ष के नेता पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन किया था। इसके अलावा लोकसभा में भी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। बागी नेताओं के अनुसार, टीएमसी के कई सांसद अलग होकर नई राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जिससे पार्टी की स्थिति और कमजोर हुई है।
ताजा हालात के बाद टीएमसी तीन हिस्सों में बंटी हुई नजर आ रही है। पहला गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला मूल संगठन है। दूसरा गुट ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में खुद को वास्तविक टीएमसी बताकर संगठन और विधानसभा में अधिकार का दावा कर रहा है। वहीं तीसरा गुट उन सांसदों का माना जा रहा है जिन्होंने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाने का फैसला किया है।
राजनीतिक संघर्ष अब केवल नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी की संपत्ति और चुनाव चिह्न तक पहुंच गया है। बागी नेताओं ने टीएमसी के चुनाव चिह्न पर दावा करने के संकेत दिए हैं। साथ ही करीब 1,100 करोड़ रुपये के पार्टी फंड को लेकर भी विवाद गहरा गया है।
विवाद के केंद्र में पार्टी के बैंक खाते भी आ गए हैं। पूर्व कोषाध्यक्ष अरूप बिस्वास द्वारा बैंक को पत्र लिखे जाने के बाद टीएमसी के तीन खातों को फ्रीज कर दिया गया। बताया जा रहा है कि इन खातों में लगभग 440 करोड़ रुपये जमा हैं। इसके विरोध में टीएमसी नेतृत्व ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और खातों को फ्रीज करने के आदेश की वैधता पर सवाल उठाए हैं।
पार्टी का कहना है कि खातों को किसके निर्देश पर और किन परिस्थितियों में फ्रीज किया गया, इसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर बागी गुट और अरूप बिस्वास वित्तीय लेन-देन की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि पार्टी के कई वित्तीय फैसले उचित जानकारी और प्रक्रिया के बिना लिए गए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह संघर्ष जल्द नहीं सुलझा तो टीएमसी को संगठनात्मक और चुनावी दोनों स्तरों पर भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब सबकी नजर निर्वाचन आयोग और अदालतों पर टिकी है, क्योंकि पार्टी के नेतृत्व, चुनाव चिह्न और वित्तीय नियंत्रण को लेकर अंतिम फैसला इन्हीं संस्थाओं के हाथ में होगा।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में और बड़े बदलावों का संकेत दे रहा है। ममता बनर्जी के नेतृत्व को पहली बार इतनी गंभीर चुनौती मिली है, जबकि बागी गुट खुद को पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि साबित करने की कोशिश में जुटा हुआ है। ऐसे में टीएमसी का भविष्य और पश्चिम बंगाल की राजनीतिक दिशा दोनों ही अनिश्चितता के दौर से गुजर रही हैं।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस