जनसुनवाई विवाद के बीच तहसीलदार दफ्तर में बेहोश-पद से हटाए जाने के बाद तनाव में आईं मनीषा मिश्रा, जिला अस्पताल में भर्ती

श्योपुर में तहसीलदार पद से हटाई गईं मनीषा मिश्रा की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। देवेंद्र गोयल आत्महत्या मामले के बाद पद से हटाए जाने के कारण वह तनाव में थीं।

जनसुनवाई विवाद के बीच तहसीलदार दफ्तर में बेहोश-पद से हटाए जाने के बाद तनाव में आईं मनीषा मिश्रा, जिला अस्पताल में भर्ती

प्राथमिक उपचार के बाद तहसीलदार मनीषा मिश्रा को होश आ गया है लेकिन उनकी तबियत अभी भी खराब है।

श्योपुर में जनसुनवाई के दौरान जहरीला पदार्थ पीने वाले फरियादी की मौत के बाद शुरू हुआ विवाद अब प्रशासनिक संकट का रूप लेता जा रहा है। गुरुवार को तहसीलदार पद से हटाकर सामान्य निर्वाचन विभाग में अटैच की गईं तहसीलदार मनीषा मिश्रा शुक्रवार सुबह अचानक कार्यालय में बेहोश हो गईं। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद तत्काल जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज जारी है। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें होश तो आ गया, लेकिन उनकी हालत अब भी नाजुक बताई जा रही है।

घटना ने पूरे प्रशासनिक अमले में हलचल पैदा कर दी है। सूचना मिलते ही अपर कलेक्टर रुपेश उपाध्याय, एसडीएम गगन मीणा सहित कई वरिष्ठ अधिकारी जिला अस्पताल पहुंचे और डॉक्टरों से मनीषा मिश्रा के स्वास्थ्य की जानकारी ली। अस्पताल परिसर में राजस्व विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की भीड़ भी जुट गई। इस पूरे घटनाक्रम ने सोशल मीडिया, प्रशासनिक कार्रवाई और मानसिक दबाव को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

दरअसल, पूरे विवाद की शुरुआत मंगलवार को कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई के दौरान हुई थी। टोड़ी गणेश बाजार निवासी देवेंद्र गोयल अपनी शिकायत लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे थे। शिकायत के समाधान को लेकर कथित नाराजगी के बीच उन्होंने परिसर में जहरीला पदार्थ पी लिया। वहां मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों में अफरा-तफरी मच गई। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

घटना के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें फरियादी की हालत और प्रशासनिक अमले की मौजूदगी दिखाई दे रही थी। वीडियो वायरल होते ही लोगों ने तहसीलदार मनीषा मिश्रा पर संवेदनहीनता और लापरवाही के आरोप लगाने शुरू कर दिए। सोशल मीडिया पर लगातार आलोचना और कार्रवाई की मांग तेज होती गई। मामला तूल पकड़ने के बाद प्रशासन पर दबाव बढ़ गया।

इसी दबाव के बीच कलेक्टर शीला दाहिमा ने गुरुवार को मनीषा मिश्रा को तहसीलदार पद से हटाकर सामान्य निर्वाचन विभाग में अटैच कर दिया। आदेश सामने आते ही प्रशासनिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गईं। हालांकि विभागीय स्तर पर इस कार्रवाई को प्रारंभिक प्रशासनिक कदम बताया गया, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे सीधे तौर पर दोष तय करने की कार्रवाई के रूप में देखा जाने लगा।

बताया जा रहा है कि कार्रवाई के बाद से मनीषा मिश्रा लगातार मानसिक तनाव में थीं। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, लगातार हो रही आलोचना और विभागीय जांच के दबाव के कारण वे बेहद परेशान थीं। शुक्रवार सुबह करीब 11 बजे जब वे कार्यालय में मौजूद थीं, तभी अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे अचेत होकर गिर पड़ीं। कर्मचारियों ने तुरंत उन्हें संभाला और जिला अस्पताल पहुंचाया।

इधर, तहसीलदार के खिलाफ हुई कार्रवाई से राजस्व विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी नाराज नजर आए। गुरुवार को राजस्व अमले ने कलेक्ट्रेट का घेराव करते हुए नारेबाजी की और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। कर्मचारियों का कहना है कि घटना के दौरान मनीषा मिश्रा ने तत्काल एंबुलेंस बुलवाकर देवेंद्र गोयल को अस्पताल भिजवाया था और इलाज के लिए जरूरी व्यवस्थाएं भी कराई थीं।

राजस्व कर्मचारियों के मुताबिक, जिस फोटो और वीडियो को लेकर विवाद खड़ा किया गया, वे पहचान सुनिश्चित करने और दस्तावेजी प्रक्रिया के उद्देश्य से बनवाए गए थे। कर्मचारियों ने कहा कि वीडियो बनाने के पीछे किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं थी, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उनका आरोप है कि बिना पूरी जांच के केवल जनदबाव के आधार पर कार्रवाई कर दी गई।

इस मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और जनाक्रोश के आधार पर किसी अधिकारी के खिलाफ इतनी जल्दी कार्रवाई करना उचित है? दूसरी ओर फरियादी की मौत को लेकर लोगों में आक्रोश भी बना हुआ है और वे जिम्मेदारी तय करने की मांग कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में प्रशासनिक अधिकारियों पर काम का दबाव पहले से अधिक बढ़ गया है। एक ओर उन्हें जनता की समस्याओं का समाधान करना होता है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पर हर घटना तुरंत सार्वजनिक हो जाती है। कई बार अधूरी जानकारी और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के कारण स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो जाती है। श्योपुर की यह घटना भी इसी बदलते माहौल की एक तस्वीर मानी जा रही है।

फिलहाल देवेंद्र गोयल आत्महत्या मामले की जांच जारी है। प्रशासन पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट तैयार कर रहा है और संबंधित अधिकारियों के बयान भी लिए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ मनीषा मिश्रा की तबीयत बिगड़ने के बाद यह मामला अब और संवेदनशील हो गया है।

राजस्व अमले ने साफ चेतावनी दी है कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई और एकतरफा कार्रवाई जारी रही तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। कर्मचारियों का कहना है कि किसी भी अधिकारी को बिना पूरी जांच के सार्वजनिक दबाव में बलि का बकरा नहीं बनाया जाना चाहिए।

श्योपुर का यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह उस मानसिक और सामाजिक दबाव की कहानी बनता जा रहा है, जिसमें आज सरकारी अधिकारी काम करने को मजबूर हैं। एक ओर जनता की अपेक्षाएं हैं, दूसरी ओर सोशल मीडिया का दबाव और प्रशासनिक जवाबदेही। इन सबके बीच अब सभी की नजर जांच रिपोर्ट और प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई है।