वीआईपी कल्चर जनता के लिए परेशानी का कारण-चंद्रकांति आर्य

वीआईपी कल्चर बड़े शहरों में आम जनता के लिए गंभीर परेशानी बनता जा रहा है। वीआईपी मूवमेंट के दौरान सड़कों को रोकने से लंबा ट्रैफिक जाम लगता है, जिससे लोगों का समय बर्बाद होता है और एंबुलेंस जैसी आपातकालीन सेवाएं भी प्रभावित होती हैं। लेख में कहा गया है कि लोकतंत्र में सड़कों पर सभी का समान अधिकार होना चाहिए, लेकिन वीआईपी संस्कृति आम नागरिकों को दोयम दर्जे का महसूस कराती है।

वीआईपी कल्चर जनता के लिए परेशानी का कारण-चंद्रकांति आर्य

वीआईपी कल्चर बना जनता की परेशानी

वीआईपी मूवमेंट से शहरों में बढ़ता ट्रैफिक जाम

एंबुलेंस और इमरजेंसी सेवाएं भी होती हैं प्रभावित

वीआईपी कल्चर नगरों और महानगरों में एक गंभीर समस्या बन गई है जिससे आम जनता को रोजाना काफी कठिनाई होती है हाल के दिनों में इस मुद्दे पर काफी चर्चा भी हुई है बड़े शहरों में वीआईपी संस्कृति से जुड़ी काफी दिक्कतें हैं जब भी किसी वीआईपी का काफिला निकलता है तो सुरक्षा कारणों से मुख्य सड़कों को 10 से 20 मिनट या उससे ज्यादा समय के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। बड़े शहरों की पहले से ही व्यस्त सड़कों पर यह बॉटलनेक का काम करता है जिससे किलोमीटर लंबा जाम लग जाता है। इमरजेंसी सेवाओं पर भी असर पड़ता है अक्सर देखा गया है कि वीआईपी मूवमेंट के दौरान एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपातकालीन गाड़ियां भी जाम में फस जाती है। जो जान माल के लिए जोखिम भरा हो सकता है।इससे समय की बर्बादी भी होती है ।वीआईपी कल्चर की वजह से दफ्तर जाने वालों और विद्यार्थियों का काफी समय सड़कों पर बर्बाद हो जाता है ।आम जनता में आक्रोश बढ़ जाता है लोकतंत्र में सड़कों पर सबका समान अधिकार होना चाहिए, ऐसा लोगों का मानना है। सुरक्षा प्रोटोकॉल के और सार्वजनिक सुविधाओं के लिए पुलिस को वीआईपी की सुरक्षा और आम जनता की सुविधा के लिए तालमेल बैठाना एक बड़ी चुनौती होती है। कई बार वीआईपी मूवमेंट के दौरान भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक लगा दी जाती है। जिससे सप्लाई चैन और व्यापार पर भी असर पड़ता है। इन दिक्कतों को देखते हुए अब मांग की जा रही है की वीआईपी मूवमेंट के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता निकाला जाए या तकनीकी का सहारा लेकर ट्रैफिक को बेहतरीन तरीके से मैनेज किया जाए। बड़े शहरों में वीआईपी आवाजाही के कारण लगने वाले ट्रैफिक जामो से जनता को होने वाली असुविधा एक गंभीर समस्या है ।सुरक्षा और सुगमता के बीच संतुलन बनाने के लिए कुछ व्यावहारिक विकल्प और सरकारी कदम इस तरह हो सकते हैं । कई प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों के लिए वीआईपी का भौतिक रूप से उपस्थित होना अनिवार्य नहीं है तो वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से यात्राओं की संख्या कम की जा सकती है। विकसित देशों की तर्ज पर सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत वीआईपी के लिए अन्य वैकल्पिक साधनों का उपयोग किया जा सकता है जिससे सड़कों पर कारों का काफिला कम हो। वीआईपी आवाजाही  को पीक आवर्स जब लोग ऑफिस और बच्चे स्कूल जाते हैं, के बजाय ऐसे समय पर रखा जाए जब सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव कम हो। सरकार द्वारा उठाए जाने वाले प्रभावी कदम स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल  ट्रैफिक सिस्टम का उपयोग जो वीआईपी वहां के गुजरते ही तुरंत सामान्य ट्रैफिक को सुचारू कर दें । अस्पताल और वीआईपी मूवमेंट के लिए अलग लाइन या अंडरपास का निर्माण ताकि मुख्य मार्ग बाधित न हो वीआईपी मूवमेंट की जानकारी पहले से ही नेविगेशन एप्स, गूगल मैप्स और रेडियो पर देना ताकि जनता वैकल्पिक मार्ग चुन सके। सुरक्षा की समीक्षा कर काफिले में वाहनों की संख्याओं को न्यूनतम भी किया जा सकता है वैकल्पिक सुरक्षा मॉडल सुरक्षा एजेंसियों को जारी ट्रैफिक के बजाय नॉनस्टॉप मूवमेंट मॉडल पर काम करना चाहिए इसमें सड़कों को पूरी तरह बंद करने की बजाय केवल उस जगह के लिए रोका जाता है जब काफिला वहां से गुजर रहा हो और काफिला निकलते ही तुरंत ट्रैफिक खोल दिया जाता है इन कदमों से न केवल आम आदमी का कीमती समय बचेगा बल्कि ईंधन की खपत और प्रदूषण में भी कमी आएगी। बड़े शहरों की भाग दौड़ और वीआईपी संस्कृति से कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं बड़े शहरों में जब किसी विशेष व्यक्ति के लिए यातायात रोका जाता है या नियमों में ढील दी जाती है तो इसके परिणाम केवल असुविधाजनक नहीं बल्कि घातक होते हैं ,जब वीआईपी मूवमेंट के कारण ट्रैफिक रुकता है तो लाखों कामकाजी घंटो का नुकसान होता है। शहरों में अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ता है। कई बार करोड़ का नुकसान भी होता है आपातकालीन सेवाओं में भी बाधाएं आती है। सबसे ह्रदयविदारक स्थिति तब होती है जब वीआइपी काफिले के कारण एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड जाम में फंस जाती है किसी के सुरक्षा के लिए किसी और के जीवन को जोखिम में डालना इस शहरों की सबसे बड़ी विडंबना है घंटे जाम में फंसने से आम नागरिकों में झुंझलाहट और रोड रेज बढ़ता है। यह सामाजिक असंतोष की भावनाओं को जन्म देता है, जहां नागरिक खुद को दोयम दर्जे का महसूस करने लगता है। भविष्य के लिए एक नई राह हैं वीआईपी सुरक्षा और जनहित के बीच एक संतुलन सेतु बनाने की आवश्यकता है। भौतिक रूप से रास्ता रोकने की बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके डायनेमिक ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाना चाहिए जिससे काफिला भी निकलता है और पीछे का ट्रैफिक भी चलता रहे। से हवाई और जल मार्ग का विकल्प भी ले सकते हैं । महत्वपूर्ण व्यक्तियों के आवागमन के लिए, हेलीकॉप्टर सेवाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि सड़कों पर दबाव कम हो और कार्यक्रमों को सुबह या शाम के विशेष समय के बजाय रात के समय या दोपहर में निर्धारित किया जाना चाहिए। प्रोटोकॉल में सादगी को अपनाना चाहिए, सुरक्षा जरूरी है लेकिन दिखावा नहीं। वीआईपी काफिलो में गाड़ियों की संख्या कम करना चाहिए। सायरन का न्यूनतम प्रयोग करना केवल ध्वनि प्रदूषण नहीं घटाएगा बल्कि जनता के मन में सम्मान भी जगाएगा। शहरों के असली वीआईपी यहां की आम जनता है जो हर परिस्थिति में इस शहर को चलाए रखती है। यदि प्रशासन और नीति निर्धारक तकनीक और संवेदनशीलता का सही मिश्रण अपनाए तो हम एक ऐसी व्यवस्था देख पाएंगे जहां सुरक्षा का अर्थ किसी की राह रोकना नहीं बल्कि सबकी राह आसान करना होगा। यह बदलाव केवल नीतियों में नहीं बल्कि हमारी राजनीतिक सोच में भी अनिवार्य है। देश में भले ही वीआईपी कल्चर को खत्म करने के लिए कई कदम उठाए गए हो लेकिन हकीकत आज भी आम जनता के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। सड़कों पर वीआईपी मूवमेंट के दौरान घंटे ट्रैफिक रोक दिया जाता है जिससे आम लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। सरकार समय-समय पर वीआईपी कल्चर खत्म करने की बात जरूर करती हैं लेकिन जमीनी स्तर पर उसका असर समिति नजर आता है। अब सवाल यह उठता कि आखिर कब तक आम आदमी विशेष अधिकार की कीमत चुकाता रहेगा ?यह विचारणीय है, इसके लिए वीआईपी सुरक्षा और जनहित के बीच एक संतुलन सेतु बनाने की आवश्यकता है।

*(लेखिका साहित्यकार हैं और समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं)*