सिद्धवाड़ (पालीताणा) की पावन भूमि पर रचा गया इतिहास-  आचार्य पदवी समारोह से खरतरगच्छ शासन को नया उजास, श्री सम्यकरत्नसागर जी बने नूतन आचार्य

सिद्धवाड़ की पावन भूमि पर आचार्य पदवी समारोह ऐतिहासिक गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। परंपरागत मान्यता से भगवान आदिनाथ की साधना स्थली मानी जाने वाली इस पुण्यभूमि पर वटवृक्ष की छाया में गुरु–शिष्य परंपरा का दिव्य दृश्य साकार हुआ।

सिद्धवाड़ (पालीताणा) की पावन भूमि पर रचा गया इतिहास-  आचार्य पदवी समारोह से खरतरगच्छ शासन को नया उजास, श्री सम्यकरत्नसागर जी बने नूतन आचार्य

सिद्धवाड़ की पावन भूमि पर ऐतिहासिक आयोजन

जैन परंपरा और सिद्धवाड़ की शास्त्रीय महिमा

वटवृक्ष की छाया में धर्मसभा

सिद्धवाड़ (पालीताणा) की पुण्यधरा पर, भगवान आदिनाथ की साधना स्थली और एक साथ 1200 दीक्षाओं से पावन मानी जाने वाली भूमि पर, वटवृक्ष की शीतल छाया में प्रकृति और अध्यात्म के दिव्य समन्वय के साथ ऐतिहासिक आचार्य पदवी समारोह भव्यता, गरिमा और शासन-मर्यादा के साथ सम्पन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि जैन शासन की प्राचीन परंपरा, अनुशासन और उत्तराधिकार की सशक्त घोषणा सिद्ध हुआ।

सिद्धवाड़ की ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय महिमा

जैन परंपरा में सिद्धवाड़ को तप, त्याग और साधना की पावन स्थली के रूप में स्मरण किया जाता है। लोकश्रुति एवं परंपरागत मान्यता के अनुसार यह क्षेत्र भगवान आदिनाथ के जन्म एवं केवलज्ञान कल्याणक से भावात्मक रूप से जुड़ा रहा है, जिसके कारण यहाँ की वायु तक अध्यात्म से अनुप्राणित मानी जाती है।

वटवृक्ष की छाया में धर्मसभा का आयोजन जैन शास्त्रीय परंपरा का जीवंत रूप है*—जहाँ प्रकृति स्वयं साक्षी बनकर धर्मसंस्कारों को गौरव प्रदान करती है। ऐसी महिमामयी भूमि पर आचार्य पदवी का सम्पन्न होना इस ऐतिहासिक क्षण की गरिमा को और भी उच्च बना गया।

गुरु–शिष्य परंपरा का दिव्य क्षण

साधु–साध्वी, श्रावक–श्राविकाओं की विशाल उपस्थिति में निर्मित समवसरण-सदृश वातावरण ने पूरे कार्यक्रम को अलौकिक ऊँचाई प्रदान की।
इस ऐतिहासिक अवसर का सबसे भावविभोर करने वाला क्षण वह रहा, जब आचार्य श्री जिन पियूषसागर सूरिश्वर जी ने अपने शिष्य के कानों में सुरीमंत्र का पावन उच्चारण किया। गुरु–शिष्य के प्रेम, विश्वास और परंपरा से आलोकित इस दृश्य ने उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालु को भावुक कर दिया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो  लगभग 880 वर्ष पूर्व स्थापित गुरु–शिष्य परंपरा पुनः सजीव होकर वर्तमान में अवतरित हो गई हो।

इतिहास की पुनरावृत्ति : दादागुरुदेव से सिद्धवाड़ तक

श्रद्धालुओं ने भावपूर्वक स्मरण किया कि खरतरगच्छ के युगप्रधान दादागुरुदेव श्री जिनदत्त सूरी जी ने लगभग    880 वर्ष पूर्व मणिधारी श्री जिनचंद्र सूरी को आचार्य पद प्रदान कर गुरु–शिष्य उत्तराधिकार की अमर परंपरा स्थापित की थी। वैसे ही सुखसागर समुदाय में गुरु के हाथों शिष्य को आचार्य पद के लिए  सूरीमंत्र  सुनाया हो ।

अजमेर दादावाड़ी स्थित दादागुरुदेव के समाधि स्थल एवं जिनोद्वार से हाल के समय में जिस आध्यात्मिक चेतना को नई गति मिली, उसी की परिणति के रूप में सिद्धवाड़ में गुरु द्वारा शिष्य को आचार्य पदवी प्रदान किए जाने का यह दिव्य दृश्य उपस्थित हुआ। समाज में यह भाव गूंजता रहा कि   युगप्रधान प्रथन दादागुरुदेव श्री ज़िन्दत्त सूरी की कृपा से इतिहास ने स्वयं को दोहराया है और खरतरगच्छ की अविच्छिन्न परंपरा ने वर्तमान में नया उजास पाया है।

नव-आचार्य की घोषणा

इसी पावन क्षण में पूज्य आचार्य श्री सम्यकरत्नसागर सूरिश्वर जी म.सा. के रूप में नव-आचार्य के नाम की विधिवत घोषणा हुई। यह घोषणा केवल पद-प्रदान नहीं, बल्कि खरतरगच्छ के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला सिद्ध हुई।
देशभर से खरतरगच्छ सहित पहली बार सभी संप्रदाय के गच्छाधिपति और आचार्य सहित 35 से अधिक गच्छाधिपति एवं आचार्यों के आशीर्वाद-वाक्षेप प्राप्त हुए। अनेक साधु–साध्वियों के शुभेच्छा संदेशों ने इस समारोह को अखिल जैन समाज की एकात्मता और सर्वस्वीकृति का प्रतीक बना दिया।

विकास के ऐतिहासिक संकल्प

इस अवसर पर  देशभर में  “9 खरतरवसी” निर्माण का ऐतिहासिक संकल्प लिया गया तथा पालीताना एवं गिरनार सहित अन्य प्रमुख तीर्थों के विकास कार्यों को गति देने का निर्णय हुआ। गिरनार की खरतरवसी ट्रस्ट में सहभागिता हेतु श्रद्धालुओं का अभूतपूर्व उत्साह देखने को मिला।
 
एकता का अद्वितीय प्रतीक

140 संघों द्वारा कांबली ओढ़ाने के भाव प्रकट किए गए, किंतु नव-आचार्य द्वारा “श्रीसंघ की एक कंबली” को सभी संघों के संयुक्त स्पर्श से ओढ़ना—विनय, एकता और अखिल भारतीय समन्वय का अनुपम उदाहरण बन गया।
इस पावन काम्बली  को जैसलमेर के भण्डार में रखे दादा गुरुदेव श्री ज़िन्दत्तसूरी जी के स्वर्गवास के समय चोला दुपट्टा मुंहपति और चादर जो अग्नि संस्कार में नहीं जले थे  वहाँ से वाक्षेप गुरु भक्तों द्वारा लायी गई थी उससे कांबली को  पूजित कर अखिल भारतीय जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ महासंघ के ट्रस्टी एवं आमंत्रित वरिष्ठ सदस्यों द्वारा श्रद्धापूर्वक ओढ़ाई गई—जो संगठन-शक्ति और सामूहिक एकता की उज्ज्वल अभिव्यक्ति बन गई।

स्वर्णिम अध्याय का शुभारंभ

सिद्धवाड़ में सम्पन्न यह समारोह खरतरगच्छ का प्रथम आचार्य पदारोहण रहा, जिसने इस भूमि के ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय महत्व को नई गरिमा प्रदान की।
आचार्य श्री जिन पियूषसागर सूरिश्वर जी के दूरदर्शी मार्गदर्शन में खरतरगच्छ एक नवीन स्वर्णिम युग की ओर अग्रसर है—ऐसा समाज में व्यापक रूप से अनुभव किया गया।
अजमेर दादावाड़ी जिनोद्वार, अखिल भारतीय जैन महासंघ एवं सूरत संघ के वरिष्ठ सदस्य चम्पालाल बोथरा (सूरत) ने कहा कि यह आयोजन श्रद्धा, अनुशासन, सेवा और परंपरा का ऐसा जीवंत संगम बन गया है, जो जैन समाज के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होगा।