दिग्विजय सिंह का प्रधानमंत्री मोदी को पत्र: CBSE की त्रिभाषा नीति पर रोक की मांग, शिक्षा व्यवस्था पर जताई गंभीर चिंता

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने तीन-भाषा नीति को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने पर चिंता जताई है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके लिए पत्र लिखा है.

दिग्विजय सिंह का प्रधानमंत्री मोदी को पत्र: CBSE की त्रिभाषा नीति पर रोक की मांग, शिक्षा व्यवस्था पर जताई गंभीर चिंता

वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सीबीएसई की कक्षा नौ के लिए त्रिभाषा नीति के अनिवार्य कार्यान्वयन पर चिंता जताई है। उन्होंने शिक्षकों और पाठ्यपुस्तकों की कमी का हवाला देते हुए पीएम मोदी से इस नीति को रोकने की अपील की है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं सांसद दिग्विजय सिंह ने केंद्रीय विद्यालय शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा लागू की जा रही त्रिभाषा नीति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक विस्तृत पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने स्कूल शिक्षा व्यवस्था में संभावित अव्यवस्था, संसाधनों की कमी और छात्रों पर पड़ने वाले शैक्षणिक दबाव को लेकर गंभीर चिंता जताई है। सिंह ने केंद्र सरकार से मांग की है कि कक्षा 9 में लागू की जा रही इस नई व्यवस्था को फिलहाल स्थगित किया जाए।

त्रिभाषा नीति को लेकर क्या है विवाद

CBSE ने हाल ही में घोषणा की है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9 में त्रिभाषा (तीन भाषाओं) की नीति लागू की जाएगी। इस नीति के तहत छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना अनिवार्य किया गया है। यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बताई जा रही है।

हालांकि, इस फैसले के बाद देश के कई हिस्सों में इसे लेकर असहमति और चिंता सामने आई है। अभिभावकों, शिक्षकों और शैक्षणिक विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े बदलाव के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं की गई है।

दिग्विजय सिंह की प्रमुख आपत्तियां

अपने पत्र में दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस नीति को लागू करने से पहले न तो पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही सभी भाषाओं के लिए पाठ्यपुस्तकें तैयार की गई हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि बिना तैयारी के इसे लागू किया गया तो स्कूलों में गंभीर शैक्षणिक अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है।

सिंह ने यह भी उल्लेख किया कि दिसंबर 2025 में CBSE की एक बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि जब तक NCERT द्वारा नई भाषा की पुस्तकें तैयार नहीं की जातीं, तब तक पुरानी व्यवस्था ही लागू रहेगी। इसके बावजूद बोर्ड ने बाद में आदेश जारी कर नई नीति को लागू करने की घोषणा कर दी।

अदालत में लंबित मामला और समय की समस्या

दिग्विजय सिंह ने अपने पत्र में यह भी कहा कि त्रिभाषा नीति को लेकर मामला वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और 15 जुलाई 2026 को इस पर निर्णय आने की संभावना है। वहीं, स्कूलों में यह नई व्यवस्था 1 जुलाई 2026 से लागू करने की तैयारी है।

इस समय-सारणी को देखते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि जब मामला न्यायालय में लंबित है, तब छात्रों पर इस नीति को थोपना उचित नहीं होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि अदालत के निर्णय से पहले इस नीति को लागू न किया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की शैक्षणिक अस्थिरता से बचा जा सके।

संसाधनों की कमी और व्यवहारिक समस्याएं

पत्र में यह भी कहा गया है कि कई स्कूलों में नई भाषाओं को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। विशेषकर संस्कृत जैसी भाषाओं को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षकों की कमी एक बड़ी समस्या है।

साथ ही, कई राज्यों और क्षेत्रों में भाषाई विविधता को देखते हुए यह नीति व्यवहारिक रूप से कठिनाई पैदा कर सकती है। दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदी का प्रचलन अपेक्षाकृत कम है, ऐसे में वहां के छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका जताई गई है।

सिंह ने यह भी कहा कि कई स्थानीय और आदिवासी भाषाएं CBSE की सूची में शामिल नहीं हैं, जिससे छात्रों को अपनी पसंद की भाषा चुनने में कठिनाई हो सकती है। इससे शिक्षा में समानता और समावेशिता के उद्देश्य पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता है।

अभिभावकों की चिंताएं

दिग्विजय सिंह ने बताया कि उन्हें अभिभावकों की ओर से एक ज्ञापन प्राप्त हुआ है, जिसमें इस नीति को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। अभिभावकों का मानना है कि अचानक किए गए इस बदलाव से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी और उन पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि कई स्कूलों में पहले से ही पाठ्यक्रम और परीक्षा प्रणाली में बदलावों के कारण असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में एक और बड़ा बदलाव छात्रों के हित में नहीं है।

CBSE के फैसलों पर सवाल

अपने पत्र में दिग्विजय सिंह ने CBSE के हालिया आदेशों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 15 मई 2026 को जारी आदेश में कक्षा 9 में तीसरी भाषा को अनिवार्य किया गया है, जबकि अभी तक नई पुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई है।

उन्होंने यह भी बताया कि स्कूलों को अस्थायी रूप से कक्षा 6 की पुरानी पुस्तकों के उपयोग की सलाह दी गई है, जो छात्रों के लिए उपयुक्त समाधान नहीं है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति से जुड़ा संदर्भ

यह त्रिभाषा नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत लागू की जा रही है, जिसका उद्देश्य छात्रों में बहुभाषिक क्षमता विकसित करना बताया गया है। नीति के अनुसार, छात्रों को कम से कम तीन भाषाएं सीखनी होंगी, ताकि वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक सक्षम बन सकें।

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इसे लागू करने से पहले जमीनी स्तर पर तैयारी जरूरी है, अन्यथा इसका उल्टा प्रभाव पड़ सकता है।

प्रधानमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप की मांग

दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है कि वे इस मामले पर तुरंत और संवेदनशीलता के साथ विचार करें। उन्होंने कहा कि लाखों छात्रों का भविष्य इस निर्णय से प्रभावित हो सकता है, इसलिए इसे जल्दबाजी में लागू नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने हाल ही में परीक्षा प्रणाली से जुड़े मुद्दों, जैसे NEET-UG और अन्य परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था और एक श्वेत पत्र जारी करने की मांग की थी।

परीक्षा प्रणाली और भरोसे का मुद्दा

पत्र में यह भी कहा गया है कि छात्रों का परीक्षा और शिक्षा प्रणाली पर भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि नीतिगत निर्णय बिना तैयारी और बिना परामर्श के लिए जाते हैं, तो इससे शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

दिग्विजय सिंह ने अंत में कहा कि शिक्षा केवल नीति का विषय नहीं है, बल्कि यह लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा हुआ संवेदनशील मुद्दा है। इसलिए हर निर्णय सोच-समझकर और व्यापक हितों को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।