फर्जी एमबीबीएस डिग्री रैकेट का मास्टरमाइंड भोपाल से गिरफ्तार: सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में 50 से ज्यादा फर्जी डॉक्टरों की आशंका, कई जिलों में छापेमारी तेज
मध्य प्रदेश में फर्जी एमबीबीएस डिग्री रैकेट का मास्टरमाइंड भोपाल से गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस को आशंका है कि इस गिरोह से जुड़े 50 से अधिक फर्जी डॉक्टर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत हो सकते हैं।
दमोह में फर्जी MBBS डिग्री के सहारे नौकरी करने के मामले का मास्टरमाइंड हीरा सिंह कौशल पुलिस की पकड़ में आ गया है। दमोह पुलिस ने उसे बुधवार को भोपाल के कोहेफिजा इलाके से गिरफ्त में लिया।
मध्य प्रदेश में फर्जी एमबीबीएस डिग्री के सहारे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नौकरी करने वाले कथित डॉक्टरों के नेटवर्क का मामला अब बड़ा रूप लेता जा रहा है। दमोह जिले से शुरू हुई जांच अब प्रदेशव्यापी कार्रवाई में बदल चुकी है। पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड को भोपाल से गिरफ्तार कर लिया है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि इस गिरोह से जुड़े 50 से अधिक फर्जी डॉक्टर प्रदेश के अलग-अलग सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में कार्यरत हो सकते हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस और जांच एजेंसियां कई जिलों में लगातार कार्रवाई कर रही हैं। इस खुलासे ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया और दस्तावेज सत्यापन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भोपाल से पकड़ा गया नेटवर्क का सरगना
पुलिस ने इस मामले में भोपाल के कोहेफिजा हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी निवासी हीरा सिंह कौशल को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि वह पूरे नेटवर्क का संचालन कर रहा था। आरोप है कि वह फर्जी एमबीबीएस डिग्रियां तैयार कराने, अभ्यर्थियों को जोड़ने और दस्तावेज उपलब्ध कराने की भूमिका निभा रहा था।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, गिरोह का नेटवर्क केवल एक जिले तक सीमित नहीं था बल्कि कई जिलों में सक्रिय था। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि फर्जी डिग्री के जरिए लोगों को सरकारी सेवाओं में प्रवेश दिलाने का काम लंबे समय से चल रहा था।
दमोह पुलिस का मानना है कि गिरफ्तार आरोपी से पूछताछ में कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं। इसी आधार पर प्रदेशभर में दबिश दी जा रही है।
50 से अधिक फर्जी डॉक्टरों के सक्रिय होने की आशंका
दमोह एसपी ने संकेत दिए हैं कि इस रैकेट का दायरा काफी बड़ा हो सकता है। पुलिस को आशंका है कि नेटवर्क से जुड़े 50 से ज्यादा लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत हो सकते हैं।
यदि जांच में यह पुष्टि होती है, तो यह मामला मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में अब तक के सबसे बड़े फर्जीवाड़ों में शामिल हो सकता है।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि किन-किन अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और विभागों में ऐसे लोगों की नियुक्ति हुई और उनके दस्तावेज किस प्रक्रिया से सत्यापित किए गए।
कई जिलों में चल रही छापेमारी
मामले की जांच अब केवल दमोह तक सीमित नहीं रही। पुलिस भोपाल, ग्वालियर, मुरैना, धार, मंडला और जबलपुर सहित कई जिलों में लगातार दबिश दे रही है।
अब तक दमोह, जबलपुर और भोपाल से चार लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।
जांच एजेंसियां संदिग्ध दस्तावेजों, मेडिकल रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड और नियुक्ति फाइलों की जांच कर रही हैं। साथ ही विभिन्न सरकारी संस्थानों से नियुक्त डॉक्टरों का विवरण भी जुटाया जा रहा है।
तीन आरोपियों की पुलिस रिमांड बढ़ी
इस मामले में पहले गिरफ्तार किए गए तीन कथित डॉक्टरों को बुधवार को दमोह न्यायालय में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें दो दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया है।
पुलिस अब इन आरोपियों से पूछताछ कर नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि पूछताछ के दौरान फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों, बिचौलियों और अन्य सहयोगियों की जानकारी मिल सकती है।
रिमांड अवधि में पुलिस यह भी पता लगाएगी कि फर्जी डिग्रियां किस स्तर पर तैयार हुईं और इन्हें सरकारी नौकरी में उपयोग करने की प्रक्रिया कैसे अपनाई गई।
ऐसे शुरू हुआ फर्जी डिग्रियों का नेटवर्क
जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क की शुरुआत कथित तौर पर मुरैना निवासी अजय मौर्य के मामले से हुई थी।
पुलिस के अनुसार, सबसे पहले उसके लिए कथित रूप से फर्जी एमबीबीएस डिग्री तैयार कराई गई थी। बाद में उसके संपर्क में आए अन्य लोगों ने भी इसी नेटवर्क के माध्यम से दस्तावेज बनवाने शुरू कर दिए।
धीरे-धीरे यह नेटवर्क विस्तार लेता गया और कई जिलों तक पहुंच गया।
जांच एजेंसियों को आशंका है कि गिरोह केवल डिग्रियां ही नहीं बल्कि अन्य शैक्षणिक और रजिस्ट्रेशन संबंधी दस्तावेज भी तैयार कर सकता था।
जीवाजी विश्वविद्यालय और रीवा मेडिकल कॉलेज के नाम का इस्तेमाल
पुलिस जांच में यह बात सामने आई है कि गिरोह द्वारा कथित तौर पर कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों के नाम का उपयोग कर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए।
प्रारंभिक जांच में जीवाजी विश्वविद्यालय और रीवा मेडिकल कॉलेज के नाम से फर्जी डिग्रियां तैयार करने की बात सामने आई है।
अब संबंधित संस्थानों के रिकॉर्ड का मिलान किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वास्तविक डिग्रियों और कथित फर्जी दस्तावेजों में क्या अंतर है।
जांच एजेंसियां विश्वविद्यालय प्रशासन और मेडिकल शिक्षा विभाग से भी जानकारी जुटा रही हैं।
मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबरों में गड़बड़ी के संकेत
मामले का सबसे गंभीर पहलू मेडिकल रजिस्ट्रेशन से जुड़ा सामने आया है।
पुलिस जांच में संकेत मिले हैं कि मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबरों में कथित तौर पर छेड़छाड़ की गई और उनका उपयोग दस्तावेजों में किया गया।
यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो मामला केवल फर्जी डिग्री तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि मेडिकल रजिस्ट्रेशन प्रणाली में भी बड़े स्तर की अनियमितता उजागर हो सकती है।
अब संबंधित एजेंसियां रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड, दस्तावेज और सत्यापन प्रक्रिया की बारीकी से जांच कर रही हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि फर्जी डिग्री धारक लोग सरकारी सेवाओं में पहुंचे, तो नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों का सत्यापन कैसे हुआ? क्या भर्ती के समय पर्याप्त जांच नहीं हुई या फिर सिस्टम में कहीं बड़ी चूक हुई?
विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं में ऐसे मामलों का असर सीधे मरीजों की सुरक्षा और इलाज की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।
अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि नेटवर्क का वास्तविक दायरा कितना बड़ा है, इसमें कौन-कौन शामिल हैं और सरकारी तंत्र तक इसकी पहुंच कैसे बनी।
फिलहाल पुलिस की कार्रवाई जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस