बुंदेलखंड की पारंपरिक ‘हरवा’ पद्धति को मिला आधुनिक रूप,जल संरक्षण की दिशा में जालौन बना मॉडल, भूजल बढ़ाने की अभिनव पहल

जालौन में पारंपरिक ‘हरवा’ पद्धति को आधुनिक तकनीक से जोड़कर जल संरक्षण की प्रभावी पहल की जा रही है। खेतों में विशेष संरचनाएं बनाकर वर्षा जल को जमीन में समाहित किया जा रहा है, जिससे भूजल स्तर बढ़ेगा, सिंचाई पर निर्भरता घटेगी और किसानों की लागत कम होगी।

बुंदेलखंड की पारंपरिक ‘हरवा’ पद्धति को मिला आधुनिक रूप,जल संरक्षण की दिशा में जालौन बना मॉडल, भूजल बढ़ाने की अभिनव पहल

परंपरागत ज्ञान और तकनीक के संगम से भूजल बढ़ाने की अनोखी पहल

उरई । बुंदेलखंड की परंपरागत जल संचयन पद्धतियों को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए जनपद जालौन में जल संरक्षण की एक अभिनव पहल की जा रही है। सदियों पुरानी “हरवा” प्रणाली को वैज्ञानिक स्वरूप देकर वर्षा जल को खेतों में ही संरक्षित एवं भूजल में पुनर्भरण (रिचार्ज) करने का कार्य तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। बुंदेलखंड क्षेत्र में तालाब, तलैया, गड़ा, नरवा और हरवा जैसी परंपरागत जल संरचनाएं जल प्रबंधन की मजबूत आधार रही हैं। इनमें “हरवा” विशेष रूप से खेतों में वर्षा के दौरान बनने वाली प्राकृतिक जलधाराओं को नियंत्रित कर पानी के प्रवाह को व्यवस्थित करने का कार्य करता है। पहले किसान बैलों से जुताई के बाद खेतों को समतल कर इन जलधाराओं का उपयोग करते थे, जो आगे चलकर बड़े नालों से जुड़ जाती थीं।

अब इसी पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए खेतों में विशेष “हरवा संरचनाओं” का निर्माण कराया जा रहा है, ताकि वर्षा का पानी खेत से बाहर बहने के बजाय जमीन में ही समा जाए। इसके तहत खेतों के उन स्थानों पर, जहां से पानी का बहाव बाहर होता है, लगभग 3 मीटर गहरे एवं 2 मीटर चौड़े गड्ढों का निर्माण किया जा रहा है। इन गड्ढों को नीचे से बोल्डर, पत्थर या ईंट के टुकड़ों से भरकर ऊपर बालू डाली जा रही है, जिससे पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बढ़ा सके।

इस योजना के अंतर्गत जनपद में लगभग 1000 हरवा संरचनाओं का निर्माण किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। इससे न केवल वर्षा जल का बेहतर उपयोग होगा, बल्कि खेतों की नमी बनी रहेगी, सिंचाई पर निर्भरता घटेगी और किसानों की लागत में भी कमी आएगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहल बुंदेलखंड जैसे जल संकट प्रभावित क्षेत्र के लिए बेहद कारगर साबित होगी। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का यह समन्वय जालौन को जल संरक्षण के क्षेत्र में एक मॉडल जनपद के रूप में स्थापित करेगा।

जिलाधिकारी ने कहा कि जल ही जीवन है इसे बचाने के लिए हर स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं। ‘हरवा’ जैसी पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित कर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षित कर सकते हैं।